बीजेपी होगी बिहार में सत्ता पर काबिज

AYUSH ANTIMA
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भारतीय राजनीति के वर्तमान कालखंड में एक अघोषित सत्य अब पूरी तरह सतह पर आ चुका है। भाजपा के नेतृत्व वाली इस नई व्यवस्था में 'दायरे' से बाहर जाने या 'बराबरी' का दावा करने वालों के लिए कोई जगह नहीं है। यहाँ या तो पूर्ण समर्पण है, या फिर राजनीतिक वनवास। 5 मार्च को पटना के विधानसभा सचिवालय में जब नीतीश कुमार ने अमित शाह की मौजूदगी में राज्यसभा के लिए अपना पर्चा भरा, तो वह केवल एक मुख्यमंत्री का इस्तीफा नहीं था, बल्कि एक चतुर क्षेत्रीय क्षत्रप का 'सम्मानजनक आत्मसमर्पण' था। नीतीश, जिन्हें कभी 'किंगमेकर' और 'सुशासन बाबू' कहा जाता था, अब दिल्ली के गलियारों में एक सुरक्षित रिटायरमेंट की ओर भेज दिए गए हैं। यह भाजपा की वह शैली है, जहाँ वह सत्ता पाने या विरोधियों को हाशिये पर धकेलने में कतई संकोच नहीं करती। ​इस शैली का शिकार होने वाले नीतीश अकेले नहीं हैं। भाजपा की इस मशीनरी ने सबसे पहले उद्धव ठाकरे को आईना दिखाया। तीन दशक पुरानी दोस्ती का वास्ता देने वाली शिवसेना जब मुख्यमंत्री पद की जिद पर अड़ी और वैचारिक पाला बदला, तो भाजपा ने न केवल उनकी सत्ता छीन ली, बल्कि उनकी पार्टी के दो फाड़ कर उन्हें 'मातोश्री' की चारदीवारी तक सीमित कर दिया। आज उद्धव अपनी विरासत बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो इस बात का सबूत है कि भाजपा अपने सहयोगियों को तब तक ही बर्दाश्त करती है, जब तक वे उसके विस्तार में सहायक होते हैं। ​हैरानी की बात यह है कि यह 'किनारे लगाने' की कला अपनों पर भी उतनी ही सलीके से लागू होती है। जगदीप धनखड़ का उदाहरण लीजिए। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से सीधी टक्कर लेने वाले धनखड़ को पहले उपराष्ट्रपति बनाकर 'पुरस्कृत' किया गया, लेकिन जैसे ही उनकी उपयोगिता के समीकरण बदले या वे व्यवस्था के तय सांचे से बाहर दिखे, उनके अचानक इस्तीफे ने सबको चौंका दिया। आज वे पेंशन के लिए आवेदन कर रहे हैं और मुख्यधारा की राजनीति से ओझल हैं। यह स्पष्ट संदेश है कि इस तंत्र में हर चेहरा एक निश्चित 'एक्सपायरी डेट' के साथ आता है। ​अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी सुगबुगाहट यह है कि नीतीश का पत्ता साफ होने के बाद, अगला नंबर किसका है। सबकी निगाहें चंद्रबाबू नायडू पर टिकी हैं। आंध्र प्रदेश में भाजपा की बैसाखी बने नायडू आज भले ही केंद्र सरकार के अस्तित्व के लिए अनिवार्य लग रहे हों, लेकिन इतिहास गवाह है कि भाजपा कभी भी 'निर्भरता' को अपनी कमजोरी नहीं बनने देती। टीडीपी के वोट बैंक में भाजपा की खामोश सेंधमारी और राज्य में उसके अपने संगठनात्मक विस्तार की गति यह संकेत दे रही है कि नायडू की 'जरूरत' को 'मजबूरी' में बदलने का खाका तैयार है। ​यही हश्र हमने बादल परिवार और चौटाला परिवार का भी देखा है। पंजाब और हरियाणा के ये ताकतवर घराने आज अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए छटपटा रहे हैं, क्योंकि भाजपा ने उनके पारंपरिक आधार को अपने 'राष्ट्रवाद' और 'लाभार्थी' कार्ड से ढहा दिया है। ​कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति अब उस दौर में है, जहाँ क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व 'खतरे के निशान' के ऊपर है। भाजपा की रणनीति बहुत साफ़ है: पहले गठबंधन करो, फिर आधार साझा करो और अंततः साथी को इतना कमजोर कर दो कि वह खुद-ब-खुद 'मार्गदर्शक मंडल' या 'इतिहास' का हिस्सा बन जाए। बिहार में नीतीश का अंत इस अध्याय का समापन नहीं, बल्कि दक्षिण की ओर बढ़ते भाजपा के अश्वमेध यज्ञ का नया प्रस्थान बिंदु है।

*महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार*

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