दादू बिन विश्वासी, जीयरा चंचल नाही ठौर। निहचै निहचल ना रहै, कछु और की और।।
ब्रह्मऋषि श्रीदादू जी महाराज कहते हैं कि अमूल्य चिंतामणि रूप हरि सबके हृदय में ही बसता है, फिर भी यह जीवात्मा प्रभु विश्वास के बिना चंचल चित्त से सुख के लिए इधर-उधर घूमता हुआ दुःख को ही प्राप्त होता है। महाभारत में सुख-दुःख,भाव-अभाव, लाभ-हानि, जीवन-मरण यह सब सभी प्राणियों को प्राप्त होते हैं, परंतु धीर मनुष्य इनके आने पर न घबराता है और न प्रसन्न होता है, क्योंकि सुख-दुःख न चाहने पर भी अवश्य प्राप्त होते है। अतः इनको सहन करने के अलावा कोई उपाय नहीं है, इन सब को सहते हुए परमात्मा का स्मरण करते रहो। योगवसिष्ठ में लिखा है जो मनुष्य जिस दुःख से दुःखी है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता, कारण की दुःखों का कभी नाश होता ही नहीं, एक के बाद एक ना एक दुःख आते ही रहते है। अतः सुख चाहने वाले साधक को भगवान का ही भजन करना चाहिए।