धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे॥ कोई मन कौं मारै रे, कोई तन कौं तारै रे, कोई आप उबारै रे॥ कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवन्ता रे॥ कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे॥ कोई पार को पाया रे, कोई मिल करि आय रे, कोई मन का भाया रे॥ कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे॥ कोई सब सुख दाता रे, कोई विधाता रे,कोई अमृत खाता कोई रे॥ नूर पिछांण रे, कोई तेज कौं जाणे रे, कोई ज्योति बखांण रे॥ कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे।। अर्थात कोई राम के स्वरूप में अनुरक्त है। कोई उसके प्रेम में मग्न है। कोई राम की प्राप्ति के लिये साधनों से मन को रोक रहे हैं। कोई इन्द्रिय संयम में लगा हुआ है। कोई राम के लिये प्रपञ्च से उपरत हो रहा है। कोई योग की युक्तिओं से आत्मा को प्राप्त करने के लिये यत्न कर रहा है। कोई-कोई स्वयं मुक्त होकर दूसरों को मुक्त करने में लगे हैं। कोई कहता है कि सत्य ही परमात्मा है, अत: सत्य का पालन करना चाहिये। कोई अपनी सद्गति के लिये चेष्टा कर रहा है। कोई पारमार्थिक उपदेश के द्वारा दूसरों को तारने में लगे हुए, कोई प्रभुप्रेमी बना है। कोई ज्ञान से संसार का अन्त जानना चाहता है। कोई समाधि में भगवान् को जानकर समाधि त्याग कर बैठा है। कोई तो अपने मन को प्रिय लगने वाले कर्म ही कर रहे हैं। कोई-कोई भाग्यशाली अपनी हृदय शय्या पर स्थित प्रभु के साथ सौभाग्य सुख का अनुभव कर रहे हैं। कोई प्रभु प्रेम में मस्त होकर उसी को देख रहे हैं। कितने ही समत्वभाव को प्राप्त होकर दूसरों की सेवा करके उनको सुखी बना रहे हैं। कोई विधाता के कार्यो को देखकर चकित हो रहा है अथवा स्वयं अपने को विधाता समझ रहा है। कोई ज्ञान प्राप्त करके उसके रस को पी रहा है। कोई-कोई ज्ञान के विचार में मग्न हो रहे हैं। कितने ही भोगभूमिरुपवन में विहार कर रहे हैं। साधनों द्वारा ईश्वर का परिचय प्राप्त करने में लगे हैं। कितने ही तेज:स्वरूप परमात्मा को भज रहे हैं। कोई-कोई उस तेजोमय ब्रह्म का वर्णन कर रहे हैं। कितने ही अपने को प्रभु स्वरूप मानते हैं। मैं तो ऐसा हूँ कि कोई भी साधन नहीं करता क्योकि कृतकृत्य हूँ। योगवासिष्ठ में लिखा है कि महात्मा आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद अपनी पारमार्थिक सत्ता को प्राप्त करके भयशोक से रहित हो जीवन्मुक्त दशा को प्राप्त हो गया और अपरिमित अपरिछिन्न अपने आनन्द के मद से उसका चित्त मस्त हो रहा है। जैसे संपूर्ण कलाओं से युक्त चन्द्रमा अपरिच्छिन्न आकाश में विहार करता हो। ऐसी ही स्थिति श्री दादूजी महाराज की होने से वे जीवन्मुक्त हैं।

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