परिवारवाद को लेकर राजस्थान में बहस छिड़ी हुई है। यह सामाजिक ताना-बाना और भारतीय समाज की परम्परा रही है कि उसके काम को उसका वारिस संभाले, चाहे वह व्यापार हो या अन्य कोई क्षेत्र हो। कांग्रेस पर परिवारवाद को लेकर मुखर रहने वाली भाजपा ने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर आरोप लगाया कि अशोक गहलोत परिवारवाद को लेकर अंधे हो गये, उन्होंने अपने बेटे को दो बार लोकसभा चुनावो में उतारा लेकिन उनको हार का मुंह देखना पडा। चुनावो में हार जीत सिक्के के दो पहलू हैं, यदि वैभव गहलोत को हार का सामना करना पड़ा तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, बहुत से दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है। अब यदि गहलोत के राजनीतिक कैरियर को देखें तो राजनीतिक विचारधारा के विपरीत होने के बावजूद मैं अशोक गहलोत की प्रशंसा करता हूं कि इतने लंबे राजनीतिक सफर में उन पर व्यक्तिगत रूप से एक भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है।
परिवारवाद के आरोप लगाने वाली भाजपा को अपने गिरेबान में भी झांककर देखना होगा। पंकज सिंह, पंकजा मुंडे, प्रीतम मुंडे, राजवीर सिंह, पूनम महाजन, मेनका गांधी, वरूण गांधी, पीयूष गोयल, रीता बहुगुणा और विजय बहुगुणा, दुष्यन्त सिंह, मानवेन्द्र सिंह, आशुतोष टंडन, हिना गवित, अनूप धोते, प्रवीण भूषण सिंह व बांसुरी स्वराज जैसे अनेको उदाहरण है, जो क्या परिवारवाद की परिभाषा में नहीं आते। भारतीय राजनीति की यह परम्परा बन गई है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का चलन हो गया है। अपने उपर लगे आरोपो को लेकर अशोक गहलोत ने पलटवार किया कि उनके मुख्यमंत्री काल में उनका बेटा मुख्यमंत्री आवास में न रहकर जयपुर में किराए के मकान में रहा है। वैभव का कभी भी राजनीतिक दखल नहीं रहा। भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचना चाहिए व जनहित के मुद्दे को ही प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने राजस्थान के पूर्व नेता प्रतिपक्ष पर भी परिवारवाद को लेकर निशाना साधा कि पुत्रमोह के कारण वे भी अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने को लेकर लालायित हैं।