होली का नाम लेते ही मेरे गांव की मिट्टी की सौंधी खुशबू आज भी मन में घुल जाती है। गांव में जन्म लेने का सौभाग्य मिला, इसलिए वहां की मौलिक ग्रामीण संस्कृति को नज़दीक से देखने और जीने का अवसर भी मिला। हमारे यहां होली केवल एक दिन का त्योंहार नहीं थी, बल्कि पूरे फाल्गुन का उत्सव हुआ करती थी। होली से कुछ दिन पहले “डांडा रोपने” की रस्म के साथ माहौल रंगीन हो उठता था। जैसे ही डांडा रोपा जाता, समझो गांव में उत्सव का शंखनाद हो गया। पुरुष, महिलाएं, युवा—सब फाल्गुनी बयार में रचे-बसे दिखाई देते। शाम ढ़लते ही चौपाल पर डफ और चंग की थाप गूंजने लगती। धमाल, लोकगीत और नृत्य ऐसा रंग जमाते कि देखने वाला भी झूम उठे। गांव की आबादी भले सैकड़ों में थी, लेकिन दिलों की दूरी शून्य थी।bहोलिका दहन पूरे गांव का सामूहिक आयोजन होता। एक ही स्थान पर सब इकट्ठा होते—बड़े-बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं—सबके चेहरों पर अग्नि की लपटों जैसा उत्साह। एक रोचक परंपरा भी थी—होलिका दहन के समय गांव का कोई एक कुंवारा युवक जलती होली में से डांडा खींचकर भाग जाता। मान्यता थी कि ऐसा करने से उसके जल्दी विवाह के योग बनते हैं। उस क्षण का रोमांच आज भी याद आते ही मुस्कान ला देता है। धुलण्डी के दिन रंग, अबीर और हंसी का ऐसा संगम होता कि मन भीग जाता। लोग एक-दूसरे के घर जाकर “रामा-श्यामा” करते, गले मिलते और शुभकामनाएं बांटते। समय के साथ शिक्षा और आजीविका के कारण गांव से दूर रहना पड़ा। जब जीवन की सांध्य बेला में लौटकर गांव आया, तो दृश्य बदला हुआ मिला। परंपराएं कहीं-कहीं शेष थीं, पर उनमें वह आत्मीयता कम दिखी। शायद त्योंहार नहीं बदले, लोग बदल गए। फिर भी उम्मीद है—जब तक गांव की मिट्टी में फागुन की महक बाकी है, होली का रंग कभी फीका नहीं पड़ेगा।
3/related/default