हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन ने अपने एक घंटे के शोधपरक संबोधन में रमज़ानुल मुबारक के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आयामों को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि रमज़ान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव जीवन के समग्र उत्थान का दिव्य कार्यक्रम है। जिस व्यवस्था को आज चिकित्सा विज्ञान “नियत अंतराल वाला उपवास” कहकर प्रचारित कर रहा है, वही सिद्धांत इस्लाम ने चौदह सौ वर्ष पूर्व रोज़े के रूप में अनिवार्य कर दिया था।
*शरीर के भीतर होने वाला परिवर्तन*
अपने वक्तव्य में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने स्पष्ट किया कि रोज़े के दौरान, शरीर का चयापचय संतुलित होता है। अतिरिक्त वसा का दहन होता है। कोशिकाओं का शुद्धिकरण (ऑटोफैजी) सक्रिय होता है। हृदय की कार्यक्षमता में सुधार आता है। प्रतिरक्षा शक्ति सुदृढ़ होती है। मानसिक स्पष्टता और स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि विश्व के अनेक चिकित्सीय अनुसंधान उपवास को रोग-प्रतिरोधी और बुढ़ापा-नियंत्रक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।
*वैज्ञानिक अनुसंधान और रमज़ान*
वर्ष 2016 में कोशिकीय शुद्धिकरण पर हुए अनुसंधान को नोबेल सम्मान प्रदान किया गया। इसमें सिद्ध हुआ कि भूख की अवस्था में मानव कोशिकाएं स्वयं को शुद्ध और पुनर्निर्मित करती हैं। रमज़ान का रोज़ा प्रतिदिन लगभग 14 से 16 घंटे तक इस प्रक्रिया को सक्रिय रखता है।
*इस्लाम का संतुलित दृष्टिकोण*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने यह भी कहा कि इस्लाम किसी पर कठोरता नहीं थोपता। रोगी को छूट, यात्री को सुविधा, वृद्ध व अशक्त को विकल्प। रमज़ान दया, संतुलन और अनुशासन का प्रतीक है।
*प्रमुख कथन*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अपने संबोधन में कहा “हम रोज़ा विज्ञान को प्रमाणित करने के लिए नहीं रखते, हम रोज़ा अल्लाह की आज्ञा से रखते हैं और वही आज्ञापालन हमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।”
*समाज के लिए संदेश*
उन्होंने बल देकर कहा रमज़ान पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, रमज़ान दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मबल है। रमज़ान भूख नहीं, बल्कि आत्म-संयम का प्रशिक्षण है। रमज़ान केवल इबादत नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव सुधार का अभियान है।
*निष्कर्ष*
आज जब संसार तनाव, रोग और असंतुलन से जूझ रहा है, तब रमज़ान यह संदेश देता है “ मानव की सबसे बड़ी शक्ति, स्वयं पर नियंत्रण और ख़ुदा से गहरा संबंध है। ”