दादु जे तूं समझें तो कहूं, साचा एक अलेख। डाल पान तजि मूल गहि, क्या दिखलावे भेख।।संतप्रवर श्री दादूदयाल जी महाराज कहते है कि हे वेशभूषा से प्रेम करने वाले साधक ! में तुझे समझा रहा हूं कि प्रभु भक्ति में वेशभूषा को कारण नही माना है किंतु केवल ह्रदय की निर्मलता ही चाहिए। उसी से प्रभु प्रसन्न होते है। अतः अपने ह्रदय को निर्मल बनाने की चेष्टा करो। जैसे वृक्ष की जड़ में पानी देने से उसके डाली के पत्ते शाखाओ में सब जगह पानी पहुँच जाता है, वैसे ही निर्गुण निराकार ब्रह्म, जो सारे जगत का कारण है, उसमें सारे देवी देवता समाये हुए है। उसकी पूजा से सभी देवों का भी पूजन हो जाता है। उपनिषद में लिखा है कि जैसे प्राणों को भोजन देने से सभी शरीर की इन्द्रियों में भोजन का रस पहुच जाता है, वैसे ही भगवान की पूजा में सबकी पूजा हो जाती है। विवेक चूड़ामणि में लिखा है कि भक्त का वेषधारण करके यदि कोई किसी की निंदा करता है, बोलता है, दूसरे की बुराई करता है, सत्य बात को भी मिथ्या करने की चेष्टा करता है तो वह प्रभु का बहुत बड़ा अपराधी है।
अतः मनुष्य को पाखण्ड को त्यागकर सत्पुरुषों का संग करना चाहिए। झूठ पाखण्ड करने वाले पुरुषों की संगति नहो करनी चाहिए ।