धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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सतगुरु चंदन बावना, लागे रहै भुवंग। दादू विष छाड़ै नहीं, कहा करै सत्संग।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू जी महाराज कहते हैं कि सर्प अपनी विष अग्नि को शांत करने के लिए चंदन वृक्ष के चारों तरफ लिपटा हुआ भी अपने विष को नहीं त्यागता। ऐसे ही अज्ञानी, कृतघ्नी, दुर्जन पुरुष भी महात्माओं का सत्संग करके भी अपने स्वभाव को बदल नहीं सकता क्योंकि स्वभाव का बदलना दुष्कर है। ऐसे अज्ञानी को सत्संग से क्या लाभ है, प्रयुक्त वह सत्संग को ही बदनाम करता है। उक्त हि विवेक चूड़ामणि सद्गुरु तो ज्ञानी तथा साधु स्वभाव के होते हैं परंतु कृतघ्न पुरुष ही अपने हृदय के दुर्गुणों को नहीं छोड़ता। जैसे चिरकाल तक मैनाक पर्वत को समुद्र में डूबे रहने पर भी उसमें कोमलता नहीं आती, वैसे ही दुर्जन की सेवा करने पर भी उसकी दुर्जनता नही जाती। उक्त हि हे मनुष्य ! दुर्जन पुरुष संतो से उपदेश पाकर भी उन्हीं की निंदा करता है और उनके उपदेशों का खंडन करता है। कुछ भी उपकार नहीं मानता, कुचेष्टा में ही लगा रहता है। अतः दुर्जन का संग अकाट्य पाप कर्म का भागी बनना है।

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