सबदौ मांहै राम रस, साधौं भरि दिया। आदि अन्ति सब सन्त मिलि, यौ दादू पीया।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि महापुरुषों के शब्द राम रस से पूर्ण भरे हुए होते हैं। मानव जन उन शब्दों को विचार विचार कर सृष्टि के आरंभ से प्रलय पर्यंत उसका पान करते हुए मुक्त हो जाते हैं। यद्दपि महापुरुषों के वचन आपात कटु लगते हैं तथापि वे औषध के समान दोषों को दूर करने में समर्थ होते हैं। अतः उनको औषध के समान पान करना चाहिए। केवल कानों को मीठे लगने वाले मधुर शब्दों से न तो दोष दूर होते है न मुक्ति मिलती है। महात्मा कविवर श्रीसुन्दरदासजी ने बतलाया है कि जैसे मेघों से बरसे हुए जल से वर्षा ऋतु के मेंढक आदि प्राणी पुनः जीवित हो उठते हैं, उसी तरह सन्त वाणी से भी अमृत झरता है। सन्तो के उपदेश से अज्ञान रूपी अंधकार उसी प्रकार नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्य के प्रकाश से अंधकार दूर हो जाया करता है।
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