अफसरों में पैसे की भूख निश्चित समय पर खत्म नहीं होती क्योंकि यह लालच, जीवनशैली की जरूरतों और गलत आचरण से जुड़ा है। भ्रष्टाचार एक व्यक्तिगत निर्णय है न कि कम आय का परिणाम है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि बिना राजनीतिक संरक्षण या गॉड फादर बिना अफसरशाही करोड़ों अरबों रूपये का भ्रष्टाचार अकेली नहीं कर सकती है। ऐसा भी समाचार पत्रों में देखने को मिलता है कि पैसे की भूख इस कदर हावी रहती है कि मांगी गई राशि में से एक पैसा भी कम नहीं करते हैं। भ्रष्टाचार में जवाबदेही की कमी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम व विभिन्न धाराओं के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि अफसरों ने भ्रष्टाचार को मौलिक अधिकार के रूप मे अंगीकार कर लिया है। हालांकि भ्रष्ट अफसरों के रंगे हाथों पकडे जाने पर बना कानून 10 साल तक कैद, जुर्माना और संपति कुर्क करने का अधिकार रखता है लेकिन राजस्थान में गृह जिले झुनझूनू में भ्रष्टाचार में पकड़े अफसरों को ईनाम के तौर पर फील्ड पोस्टिंग मिल जाती है। भ्रष्ट अफसरों को लेकर उनकी जांच शुरु करने से पहले जांच अधिकारियों को सरकार से इजाजत लेने की आवश्यकता होती है लेकिन इस अनुमति को लेकर यही बात कही जा सकती है कि दूध की रखवाली बिल्ली को सौंप दी जाए। भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार की मंजूरी के अभाव में अफसरों ने भ्रष्टाचार को अपना मौलिक अधिकार समझ लिया है। सरकारी प्रक्रियाओं, निर्णय लेने और सार्वजनिक प्रशासन में पारदर्शिता की कमी भ्रष्ट आचरण के लिए सुनहरे अवसर प्रदान करती है। प्रशासनिक मामलो में राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते सरकारी संस्थाओं को अपनी स्वायत्तता से समझोता करने को मजबूर होना पड़ता है। राजनेता व्यक्तिगत या पार्टी लाभ के चलते अफसऱो पर भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल होने का दबाव डाला जाता है। विदित हो पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर जल जीवन मिशन मे हुआ अंधाधुंध भ्रष्टाचार इस बात की और संकेत करता है कि सरकारें चाहें कितने ही दावे करती रहे कि वह भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टोलरेंस पर काम कर रही है लेकिन यह आदर्श की बाते सुनने में बहुत ही अच्छी लगती है लेकिन यथार्थ के धरातल पर जल जीवन मिशन में हुआ घोटाला इसका प्रमाण है कि बिना राजनीतिक संरक्षण बिना यह कतई संभव नहीं हो सकता। पानी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर यह भ्रष्टाचार का जो खेल हो रहा है तो बाकी क्षेत्रों के हालातों का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस भ्रष्टाचार को लेकर तत्कालीन सरकारें भी कहती रही है कि सरकार जब एक रूपया विकास के लिए भेजती है तो आमजन तक दस पैसे ही पहुंचते हैं यानी नब्बे पैसे की बंदरबांट हो जाती है। शेखावाटी क्षेत्र खासकर पिलानी विधानसभा पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहा है, इसको लेकर सरकार ने आमजन के हाथों में यमुना जल का झुनझुना पकड़ा दिया लेकिन इसमें प्रगति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस परियोजना को लेकर समझौता हुए दो साल से ज्यादा का समय हो गया लेकिन अभी तक डीपीआर भी नहीं बन पाई है। सरकार ने इस बजट मे बत्तीस हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। इसको लेकर मुझे एक मारवाड़ी कहावत याद आती है कि "अं ऊंट न बीस किलो देशी घी खुवाणू बोल राख्यो है, पाछै भी यो चालै क्यूं कोनी।"
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