कहते हैं कि जब कोई बच्चा रोकर अपना विरोध प्रदर्शन न करें तो उसकी मां भी उसको दूध नहीं पिलाती। राजस्थान के माली सैनी समाज ने जयपुर मे 12 प्रतिशत आरक्षण को लेकर जयपुर में एक विशाल प्रदर्शन किया। सूत्रों की मानें तो संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष ने दावा किया है कि सरकार उनकी मांगों को लेकर वार्ता करने को राजी हो गई है। उनके अनुसार मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भरोसा दिलाया है कि वे स्वयं होली के बाद खुद संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों से वार्ता करेंगे। उनके अनुसार सरकार आरक्षण को लेकर एक कमेटी के गठन को लेकर राजी हो गई है। इसके साथ ही फुले और लव कुश बोर्ड की बहाली व ज्योतिबा फुले दंपति को भारत रत्न दिलाने को लेकर केन्द्र सरकार को पत्र लिखने पर भी सरकार राजी हो गई है। इसी तर्ज पर संगठित होकर गुर्जर समाज ने पांच प्रतिशत आरक्षण ले लिया था।
उपरोक्त प्रकरण को यदि असंगठित विप्र समाज के परिपेक्ष्य में देखे तो जो ईडब्ल्यूएस आरक्षण में जो विसंगतियां है और समाज की महिलाएं इससे वंचित हो रही है, उन विसंगतियों को सरकार ने अभी तक दूर नहीं किया है। विदित हो निवर्तमान अशोक गहलोत सरकार ने विप्र कल्याण बोर्ड का गठन किया था व इसके लिए बजट में 100 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया था लेकिन दुर्भाग्य कि वह कल्याण बोर्ड कागजों से ही बाहर नहीं निकल पाया। वर्तमान में भजन लाल शर्मा खुद विप्र समाज से आते हैं लेकिन अभी तक विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन न करना उनकी समाज के प्रति सोच को उजागर करता है। एक कहावत है कि यह मत सोचो की समाज ने हमें क्या दिया, हमारी यह सोच होनी चाहिए कि हम समाज को क्या दे रहे हैं। आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) के माध्यम से अखिल भारतीय ब्राह्मण परिषद (रजि) ने विप्र कल्याण बोर्ड के गठन को लेकर अपने लेखों में मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा का ध्यान खींचा था व उनको पत्र लिखकर भी विप्र कल्याण बोर्ड के पुनर्गठन की मांग की थी कि इसकी बागडोर किसी राजनीतिक व्यक्ति को न देकर ऐसे महानुभाव को सौपी जाए, जो विप्र समाज के लिए निष्ठा व समर्पण का भाव रखें लेकिन मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने उस पत्र को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया। विप्र कल्याण बोर्ड का गठन न होने के पीछे मुख्य कारण है कि असंगठित समाज किसी का भला नहीं कर सकता, हां इतना जरूर है कि समाज की आड़ लेकर खुद अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते है। यही विप्र समाज के साथ हो रहा है कि समाज को सीढ़ी बनाकर स्वार्थी नेता अपना स्वार्थ सिद्ध कर उस सीढ़ी को दूर फेंक देते हैं। पांच अंगुलियो में कोई ताकत नहीं होती लेकिन यदि यही पांचों अंगुलियां संगठित होकर मुक्के का रूप धारण कर लेती है तो ताकत का रूप ले लेती है। संगठन में ही शक्ति निहित होती है व संगठित समाज किसी भी सरकार की चूले हिलाने का मादा रखता है, इसका उदाहरण हमारे सामने सैनी व गूर्जर समाज का है।