सोशल मिडिया में कैद बचपन, कैसे होगा सनातनी मूल्यों का पोषण

AYUSH ANTIMA
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सभ्य सनातन समाज में संयुक्त परिवारों का विलोपन एक गंभीर व विचिरणीय समस्या है। आधुनिक परिवेश में हम की सोच ने मैं व मेरा ने ले लिया है। परिवारों के इस विखंडन के दौर में इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित बचपन p है। दादा-दादी, नाना-नानी के संरक्षण में पलने वाला बचपन व उनकी कहानियां सुनने वाला बचपन इंटरनेट, टीवी, सोशल मीडिया व विडियो गेम की दुनिया में कैद होकर रह गया है। बच्चों के इस मनो शारीरिक विकास में दैहिम समाज नदारद है। आर्थिक दबावों के कारण माता-पिता को इतनी फुर्सत नहीं कि वह बच्चों को सही चीजों के चयन के बारे में बता सके। बच्चों को सामूहिक रूप से सामने बैठाकर सनातनी संस्कृति व हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से अवगत करवाने वाले परिवार और स्कूल उनसे दूर हो रहे हैं। देखा जाए तो बचपन मनोरंजन की दैहिम दुनिया से छिटक कर संचार माध्यमों की दुनिया में सिमटकर रह गया है। 
आधुनिक परिवेश में पारस्परिकता, प्रेम, बंधुत्व, मनुष्यता, सहानुभूति, मानवीय संवेदना जैसे मूल्यों का अभाव है या यह कहें कि यह शब्द आधुनिक शब्दावली से गायब हो गये है। आधुनिक बचपन में सफलता की सीढ़ीयों पर चढ़ने की ललक तो बहुत है लेकिन असफल हो जाने पर धैर्य व संयम का पुर्णतया अभाव है। डिजिटल व सोशल मीडिया ने बचपन को चेतना शून्य करने के साथ ही उनके व्यवहारिक व सामाजिक ज्ञान को भी शून्य कर दिया है। हम सनातन संस्कारों व सनातन मूल्यों की बात करते हैं, इसको लेकर बड़े बड़े आयोजन देखने को मिलते हैं लेकिन क्या इस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर ढूंढने की जहमत उठाई कि हम अपने खुद के परिवार में कितने सनातनी मूल्यों का पोषण कर रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी व बचपन जब सनातन धर्म की परम्पराओं और मान्यताओं को लेकर विमुख होकर जब सोशल मीडिया व इंटरनेट की भौडी दुनिया में खोया हुआ है तो सनातन मूल्यों को बचाने की बात बेमानी होगा क्योंकि कल का भविष्य आज के बचपन और युवा पीढ़ी पर टिका हुआ है। मिट्टी तब तक मिटटी है व उसको स्वरूप देने वाला कारीगर ही होता है। वह उसकी निर्माण क्षमता व कारीगरी पर निर्भर करता है कि वह उस मिट्टी की सुराही, मटका या अन्य कोई बर्तन बनाकर अपनी कारीगरी की कुशलता का परिचय देता है। इसी तरह बचपन भी एक कच्ची मिट्टी की तरह होता है और यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे किस स्वरूप मे ढाले। हम सनातन धर्म की मान्यताओं व परम्पराओं के पोषण व संरक्षण की बात करते हैं लेकिन आने वाली पीढ़ी को इससे रूबरू न करवाकर एकाकी जीवन जीने व पश्चिमी संस्कृति की तरफ धकेल रहे हैं।

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