जयपुर (श्रीराम इंदौरिया): केंद्रीय बजट 2026 पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए संयुक्त अभिभावक संघ ने केंद्र सरकार पर शिक्षा व्यवस्था की घोर उपेक्षा का आरोप लगाया है। संघ का कहना है कि बजट में शिक्षा को लेकर न तो कोई ठोस दूरदर्शी नीति दिखाई देती है और न ही सरकारी स्कूलों को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक वित्तीय प्रावधान। संघ के प्रदेश अध्यक्ष अरविंद अग्रवाल ने कहा कि “देश के करोड़ों विद्यार्थियों और अभिभावकों को इस बजट से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन एक बार फिर शिक्षा क्षेत्र को केवल आंकड़ों तक सीमित कर दिया गया। सरकारी स्कूलों के ढांचे, शिक्षकों की कमी, सुरक्षा, समान पाठ्यक्रम और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार पूरी तरह मौन है। यह बजट स्पष्ट रूप से शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देता है।”
उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार को बाजार के हवाले करना दुर्भाग्यपूर्ण है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ रहा है।
वहीं संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “बजट 2026 में शिक्षा सुधार के नाम पर केवल खोखले दावे किए गए हैं। निजी स्कूलों की मनमानी फीस, ड्रेस, किताबों और अन्य शुल्कों पर अंकुश लगाने के लिए कोई सख्त प्रावधान नहीं किया गया, जिससे यह साफ है कि सरकार शिक्षा माफियाओं को खुला संरक्षण दे रही है।” उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश नहीं बढ़ेगा और सख्त नियामक कानून लागू नहीं होंगे, तब तक ‘सबको समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ केवल एक नारा बनकर रह जाएगा। संयुक्त अभिभावक संघ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि—
* शिक्षा बजट को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के न्यूनतम 10% तक बढ़ाया जाए।
* सरकारी स्कूलों को विश्वस्तरीय बनाने हेतु ठोस प्रावधान किए जाएं।
* निजी स्कूलों की मनमानी पर सख्त कानून लागू हों।
* केजी से 12वीं तक समान पाठ्यक्रम और समान शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकें अनिवार्य रूप से लागू की जाए।
* वन नेशन वन एजुकेशन पूरे देश ने लागू किया जाए।
संघ ने स्पष्ट किया कि यदि शिक्षा के मुद्दे पर सरकार ने शीघ्र गंभीर कदम नहीं उठाए, तो देशभर में अभिभावकों और विद्यार्थियों के साथ मिलकर जनआंदोलन किया जाएगा।