इसे कहते हैं एक तीर से दो नहीं, कई शिकार करना। एक ही बयान से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और सरकार को कमजोर साबित करने की कोशिश की। यह जताया कि राज्य में अफसरशाही हावी है और कार्यकर्ताओं को भी ये संदेश देकर उकसा दिया कि उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जयपुर में शनिवार को भाजपा की संगठनात्मक कार्यशाला में वसुंधरा ने मौके पर चौका मार दिया। सवाल ये है कि अब भाजपा की राजनीति में लगभग हाशिए पर जा चुकी वसुंधरा राजे का ये बयान किसके लिए संदेश था, खुद की सरकार के लिए। कार्यकर्ताओं के लिए या अपनी उपेक्षा से उपजी नाराजगी जताने के लिए केंद्रीय आलाकमान को।
*पहले वसुंधरा के बयान का सार*
इसे उन्होंने खुद अपने एक्स अकाउंट पर भी पोस्ट किया है,"भाजपा बिना कार्यकर्ता के प्राण विहीन है। इसलिए जरूरी है कि हम कार्यकर्ता को मजबूत करें। गांव में बूथ अध्यक्ष, मंडल में मंडल अध्यक्ष और जिलों में जिलाध्यक्ष हमारे एंबेसेडर है। उनके साइन से जनता के काम हो। उनकी एक घंटी में अधिकारी फोन उठाएं या भुगतने के लिए तैयार रहे। हमारे कार्यकर्ताओं की आवाज ही पीएम की आवाज है। कार्यकर्ताओं की आवाज बुलंद रहे, उसकी उपेक्षा बर्दाश्त नहीं होगी। आज जिस तरफ देखो, उधर भाजपा है। ये कार्यकर्ताओं की तपस्या का फल है।" इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी पार्टी की मजबूती में उसके जमीनी कार्यकर्ताओं का त्याग, निष्ठा, समर्पण होता है। वह कार्यकर्ता, जो दरियां उठाता है, आमसभाओं के लिए भीड़ जुटाता है, नेताओं के पोस्टर लगाता है, चुनावों में मतदाताओं को घर से निकाल कर मतदान केंद्रों तक लाता है लेकिन सवाल ये है कि क्या ऐसे कार्यकर्ताओं को पार्टी के सत्ता में आने के बाद महत्व मिल पाता है, निश्चित रूप से नहीं। तब सत्ता की मलाई चाटने के लिए नेताओं के चाटुकार और दलाल किस्म के नेता उन्हें घेर लेते हैं और कार्यकर्ता ताकता ही रह जाता है। कांग्रेस में तो फिर भी कार्यकर्ता अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से जता भी देता है लेकिन खुद को अनुशासित कहने वाली भाजपा में कार्यकर्ताओं की आवाज घुटकर रह जाती है। वसुंधरा ने सही कहा कि कार्यकर्ताओं के काम होने चाहिए और उन्हें पूरा सम्मान भी मिलना चाहिए लेकिन क्या खुद वसुंधरा राजे के दो कार्यकाल में ऐसा था कि कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान मिला और उनके कहने पर सभी काम हुए। तब उन्होंने कितनी बार अधिकारियों को इस तरह की चेतावनी दी कि अगर कार्यकर्ताओं का फोन एक घंटी पर नहीं उठाया तो परिणाम भुगतेंगे। हकीकत ये है कि राजे के राज में भी अफसरों की चलती थी और कार्यकर्ता उपेक्षित था। हां, इसमें कुछ ज्यादा कम जरूर हो सकता है क्योंकि भजन लाल शर्मा की सरकार तो लगता है पूरी तरह से अफसरशाही की गिरफ्त में ही है। ऐसे में कार्यकर्ता तो क्या, कई विधायक और सांसद बीते दो साल से ये कह रहे हैं कि अधिकारी उनकी सुनवाई नहीं करते। ना ही उनके कहने पर काम करते हैं। कई मंत्री तक यह शिकायत कर चुके हैं कि सरकार को अफसर चला रहे हैं, दरअसल पर्ची से मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही यह धारणा प्रचलित है और वसुंधरा का बयान इसे और मजबूत करेगा। कार्यकर्ताओं को अचानक भाजपा के प्राण बताने और अधिकारी परिणाम भुगतने को तैयार रहे, यह कहकर उन्होंने क्या कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए उकसाया है कि अगर काम नहीं होते हो तो वह अफसरों से सीधे निपटें। अगर ऐसा हुआ तो क्या इससे भाजपा सरकार की बदनामी नहीं होगी। फिर वसुंधरा राजे ने किस हैसियत से अधिकारियों को यह चेतावनी दी। वह मुख्यमंत्री नहीं है, महज एक विधायक है। अगर ये परिणाम भुगतने की चेतावनी भजन लाल शर्मा देते, तो समझ आता की अधिकारी काम नहीं करेंगे, तो उन्हें तबादले, निलंबन जैसे परिणाम भुगताने पड़ सकते हैं लेकिन यह वसुंधरा राजे तो कर नहीं सकती है, तो क्या वो कार्यकर्ताओं को टकराव के लिए ही उकसा रही है। वैसे भी राज्य में भाजपा की सरकार बनने के 2 साल बाद भी राजनीतिक नियुक्तियां और मनोनीत पदों पर नेताओं और कार्यकर्ताओं की तैनाती नहीं की गई है। इससे उनमें असंतोष है और अब अप्रैल में होने वाले नगर निकाय और पंचायत चुनाव तक इसकी संभावना भी नहीं है। ऐसे में वसुंधरा के बयान का असर क्या इन चुनाव पर भी पड़ सकता है। उम्मीद के मुताबिक कांग्रेस ने वसुंधरा के बयान को लपक लिया है। नेता विपक्ष टीकाराम जूली का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने वही बात दोहरा दी, जो हम लगातार कह रहे हैं। भाजपा सरकार में अफसरशाही निरंकुश है। इसलिए आमजन तो छोड़िए, भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं हो रही है। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा जी को अब तो ध्यान देना चाहिए।
*ओम माथुर, वरिष्ठ पत्रकार*