गोविन्द ! नाम तेरा, जीवन मेरा, तारण भोपारा। आगे इहिं नाम लागे, संतनि आधारा॥ कर विचार तत्त सार, पूरण धन पाया। अखिल नाम अगम ठाम, भाग हमारे आया॥ भक्ति मूल मुक्ति मूल, भौजल निस्तरना। भर्म कर्म भंजनां भै, किल्विष सब हरना॥ सकल सिद्धि नव निधि, पूरण सब कामां। राम रूप तत्त अनूप, दादू निज नामां॥ अर्थात संसार से पार करने वाले हे गोविन्द ! तेरा नाम ही मेरे जीवन का सर्वस्व सार है। पूर्वकाल के साधु भी राम नाम को ही भगवत्प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन बतलाते हैं। सत्पुरुषों का तो नाम ही एक आधार है। विचार कर मैंने देखा है कि तत्त्व-ज्ञान का भी सारभूत नाम ही है, नाम ही मेरा पूर्ण धन हैं। राम ही परमधाम स्वरूप ब्रह्म है। भाग्य से ही मेरे हृदय में राम-नाम की आसक्ति पैदा हुई है। वेद के जानने वाले राम नाम को ही भक्ति-मुक्ति का देने वाला बतलाते हैं। नाम ही भवबन्धन को नष्ट करने वाला है। पाप और विकारों का नाशक नाम ही है। अष्टसिद्धि, नवनिधि का देने वाला, संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला, नाम ही है। अधिक क्या कहूं-राम नाम तो राम रूप ही है, अत: अनुपम है।
रामरहस्योपनिषद् में लिखा है कि-मंत्रराज श्रीराम का अर्थ अच्छी तरह बतला रहा हूं। अष्टाक्षर नारायण, पंचाक्षर शिव मंत्रों में दो अक्षर 'रा' और 'म' यही राम है, जिसमें योगीजन रमण करते हैं। रकार अग्नि का वाचक है, जो प्रकाश के अर्थ में जाना जाता है। रकार सच्चिदानन्द रूप है, इसका अर्थ परमात्मा बतलाया जाता। व्यञ्जन निष्कल ब्रह्म है और आकार-स्वर प्राण एवं मायावाचक है। व्यञ्जन के साथ जो स्वरसंयोग है, उसे चेतन के साथ प्राण संयोजन समझो। इसलिये ज्योतिर्मय आकार की योजना की गयी है। मकार अभ्युदय का वाचक है, अत: उसे माया भी कहते हैं। यह मकार राम मंत्र का बीज है। इसलिये राम शब्द से मायायुक्त (लीलामय) ब्रह्म का बोध होता है। रां मे जो अनुस्वार उच्चारित होता है, उसको बिन्दु कहते हैं। उक्त बीज सबिन्दु पुरुष का बोधक है। वह पुरुष शिव चन्द्र सूर्य रूप है, ज्योति उसकी शिखा है और नाद रूप है। उस नाद को ही प्रकृति कहा जाता है। प्रकृति और पुरुष का आविर्भाव माया युक्त ब्रह्म से हुआ है। यह बिन्दु नादात्मक बीज अग्नि-कला और सोम-कलात्मक है। यह अग्नि सोमात्मक बीज राम मंत्र में प्रतिष्ठित है। जैसे बड़ के वृक्ष के अन्दर प्राकृत विशाल वृक्ष अवस्थित है, उसी प्रकार राम बीज में यह संपूर्ण चराचरात्मक जगत् निहित है। बीजोक्त उभयार्थता राम नाम में देखी जाती है। बीज माया-विनिर्मुक्त परब्रह्म कहा जाता है, वह साधकों के लिये मोक्षदायक है और मकार भोगप्रदाता माना गया है, क्योंकि वह मां लक्ष्मी का रूप है। अत: राम नाम भोग और मोक्ष दोनों का देने वाला है। राम का आदि अक्षर रा तत्पदार्थ है, मकार त्वं पदार्थ है। इन दोनों का संयोजन “असि" के अर्थ में हुआ है। अत: राम का अर्थ हुआ “तत्त्वमसि” अर्थात् "वह ब्रह्म तुम हो" ऐसा तत्त्ववेत्ता पुरुष जानते हैं। “तत्त्वमसि” आदि वेदान्तवाक्य तो केवल मुक्ति के देने वाले हैं परन्तु राम-मंत्र भोग,मोक्ष, दोनों का दाता है। अत: वेदान्त वाक्यों से भी अधिक महत्वप्रद है। राम मंत्र में समस्त देहधारियों का अधिकार है।