एक समय था, जब रात को पोने नौ बजे लोग रेडियो के कान लगा लेते थे व मधुर आवाज में सुनाई देता था, यह आकाशवाणी है, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए। फिर सुबह गांव की चौपालों पर अखबारों व रेडियो के समाचारों का विश्लेषण होता था व इस बात का दंभ भरा जाता था कि यह रेडियो व अखबार की खबर है। यह विश्वास इस बात को इंगित करता था कि पत्रकारिता की कितनी विश्वसनीयता थी। समय बदला, इलैक्ट्रोनिक मीडिया का जमाना आया, सबसे तेज सबसे पहले की तर्ज पर पत्रकारिता के मूल्यों को तिलांजली देकर पत्रकारिता सियासत की ड्योढ़ी पर नाक रगड़ने लगी। पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट के स्तर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक न्यूज चैनल ने दो हजार के नोट में नैनों चिप की बात कहकर सरकार के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की, तत्पश्चात् यूट्यूबर व न्यूज पोर्टल्स ने पत्रकारिकता जगत में पैर जमा लिए। एक बढिया मोबाइल फोन व एक बढिया माउथ पीस ही सच्ची व सटीक पत्रकारिता की पहचान हो गई। सूत्रों की मानें तो रजिस्ट्रेशन नंबर के बिना इन यूट्यूबर्स व न्यूज पोर्टल्स के प्रति उदयपुरवाटी में जनता आक्रोशित हैं कि इन यूट्यूबर्स व न्यूज पोर्टल्स ने पत्रकारिकता जगत को जनता में अविश्वसनीय बना दिया। इसमें जिला प्रशासन का भी विशेष योगदान देखने को मिल रहा है कि सरकारी आयोजनों की कवरेज के लिए इनको स्थान दिया जाता है। इन यूट्यूबर्स व न्यूज पोर्टल्स का तमाशा चिड़ावा के अस्पताल प्रकरण में देखने को मिला। इसको लेकर जिला प्रशासन को संज्ञान लेना होगा, जिससे पत्रकारिता के मूल्यों को बचाया जा सके। जिनको लेकर राजस्थान की पत्रकारिता के भीष्म पितामह पंडित झाबरमल शर्मा अंग्रेजी सियासत से टकरा गये थे। पत्रकारिता सरकार व आमजन के बीच सेतु का काम करती है। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को आमजन तक पहुंचाना व सरकार की जन विरोधी नीतियों का पुरजोर विरोध करना ही कलम का धर्म होना चाहिए। भारत के लोकतंत्र का यह सौन्दर्य रहा है कि पत्रकारिता को उसके मजबूत स्तम्भ के रूप में जाना जाता है लेकिन दुर्भाग्य कि आधुनिक परिवेश में यह स्तम्भ अर्थ के बोझ से दबकर गिरने की तरफ बढ़ रहा है। सरकार यदि मार्च पास्ट करती है तो मीडिया इसे मैराथन दौड़ कहकर महिमा मंडित करता है। इन यूट्यूबर्स व न्यूज पोर्टल्स के प्रति जनता में बढ़ते आक्रोश के मध्यनजर जिला प्रशासन को संज्ञान लेना होगा कि बिना रजिस्ट्रेशन के कोई भी न्यूज पोर्टल्स व यूट्यूबर्स सरकारी आयोजनों की कवरेज करने के लिए प्रतिबंधित किया जाए, जिससे पत्रकारिता पर जनता का विश्वास कायम रह सके। विदित हो किसी का आरएनआई से मान्य अख़बार है तो आप न्यूज पोर्टल चला सकते हो किन्तु बहुत से ऐसे न्यूज पोर्टल चल रहे हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है और चलाने वालों को ना पत्रकारिता का अनुभव है और ना ही उनकी इस क्षेत्र में कोई शैक्षणिक योग्यता लेकिन प्रशासन ना जाने क्यों कार्यवाही करने से इतना भयभीत है। अभी 04 जनवरी को आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) के माध्यम से सम्पादक डॉ.श्रीराम इंदौरिया ने भी प्रशासन से आग्रह किया था ओर उसी न्यूज की कटिंग को अपने ट्विटर हैंडल पर लगाया था, जिसे 34.5 हजार लोगों ने देखा था लेकिन परिणाम शून्य रहा। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग (DIPR), प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो (PIB), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB), मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO, Rajasthan) को टैग करने के बाद भी ना कोई प्रतिक्रिया और ना ही कोई कार्यवाही के आदेश जारी किये गये। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का मंत्रालय मुख्यमंत्री महोदय के अधीन होने के बावजूद भी आखिर प्रशासन कोई भी कार्यवाही करने से इतना भयभीत क्यों है। आखिर प्रदेश के समस्त जिला कलेक्टर को यूट्यूब चैनल और न्यूज पोर्टल पर कार्यवाही के आदेश क्यों नहीं दिये जाते। क्यों उनकी शैक्षणिक योग्यता की जांच नहीं की जाती।
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