धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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भक्ति मांगू बाप भक्ति मांगू, मूनै ताहरा नांउं नों प्रेम लागू। शिवपुर ब्रह्मपुर सर्व सौं कीजिये, अमर थावा नहीं लोक मांगूं। आप अवलम्बन ताहरा अंगनौं, भक्ति सजीवनी रंग राचूं। देहनें गेहनौं बास बैकुण्ठ तणौं, इन्द्र आसण नहीं मुक्ति जाचूं॥ भक्ति वाहली खरी, आप अविचल हरी, निर्मलौ नाम रस पान भावै। सिद्धि नैं ऋद्धि नैं राज रूडौ नहीं, देव पद माहरै काजि न आवै॥ आत्मा अन्तर सदा निरन्तर, ताहरी बापजी भक्ति दीजै। कहै दादू हिवै कोड़ी दत्त आपै, तुम्ह बिना ते अम्हे नहीं लीजै॥ अर्थात हे परमपिता परमेश्वर ! मैं आपसे भक्ति मांगता हूँ, अत: भक्ति प्रदान करो। आपके नाम से मेरा बड़ा ही प्रेम है। मैं कैलाश, ब्रह्मलोक, स्वर्गवास इनको नहीं चाहता। इनसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मेरे को तो आप अपने स्वरूप का आश्रय प्रदान करें। स्वरूप का साक्षात्कार करवा कर जीवनोपयोगिनी आपकी भक्ति का अनुराग प्रदान करें। मैं देह, गेह, बैकुण्ठवास तथा मुक्ति को भी कामना नहीं करता। मुझे तो आपकी भक्ति ही प्यारी है। आपके नामोच्चारण में बड़ा ही रस आता है। अतः वे ही प्रदान करें और मैं ऋद्धि-सिद्धि तथा देव-पद भी नहीं चाहता, क्योंकि वे आपको भक्ति के बिना निरर्थक है, किन्तु आपको भक्ति तो इन सबसे श्रेष्ठ है। अत: वह ही चाहता हूँ और आप भी वही भक्ति प्रदान करें। जो शाश्वती प्रीति अविवेकी लोगों को विषय में होती है, ऐसी ही प्रीति आपके नामोच्चारण करते समय मेरे हृदय में बनी रहे। वह दृढ प्रीति मेरे हृदय से कभी दूर न हो। हे नाथ चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद अत्यन्त दुर्लभ यह मनुष्य शरीर मिला है। यह ही आपके दर्शन करने का सुन्दर अवसर है। कृपया अब तो मुझ दीन की दर्द-भरी कथा सुनो और मुझे अपनाओ। हे प्रभो !इस समय भी यदि आप दया नहीं करेंगे तो आपको छोड़कर किसके द्वार पर जाऊ, कोई रास्ता बतलाइये। हे भगवन् ! में अनादिकाल से अपने कर्मफलों को भोगते-भोगते अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ। उनकी दुःख ज्वाला दिन-रात मुझे जलाती रहती है। मेरे शत्रु कभी शान्त नहीं होते थे। विषयों की प्यास बढ़ती ही जाती थी। कभी किसी प्रकार से भी क्षण भर के लिये भी मुझे शान्ति नहीं मिली। हे शरणगद ! अब मैं आपके भय, मृत्यु और शोक से रहित चरणकमलों की शरण में आया हूँ। अत: हे जगत् के स्वामी ! आप मुझ शरणागत की रक्षा कीजिये। श्रीमदभागवत में भी कहा है कि-हे हरे। आप मुझ पर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्य भाव से आपके चरण कमलों के आश्रित सेवकों की सेवा करने का अवसर मुझे अगले जन्म में प्राप्त हो। हे नाथ! मेरा मन आपके मंगलमय गुणों का स्मरण करता रहे। मेरी वाणी उन्हों का गान करे और शरीर आपका ही काम करता रहे। हे नाथ! मैं आपको छोड़कर न स्वर्ग लोक, न ब्रह्मलोक, न भूमण्डल का सार्वभौम राज्य, न रसातल का एक मात्र राज्य चाहता हूँ और न योग की सिद्धियाँ, यहाँ तक कि मुझे मोक्ष भी नहीं चाहिये।

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