बैरी मारे मरि गये, चित थै बिसरे नांही। दादू अजहूं साल है, समझी देख मन मांहि।। संतप्रवर ब्रह्मर्षि श्री दादू जी महाराज कहते हैं कि विवेक विचार द्वारा काम, क्रोध आदि शत्रुओं को मारने पर भी वह यदि चित से विस्मृत नहीं हुए है तो साधक को मरे हुए भी वे दुःख देते रहते हैं क्योंकि वह स्मृति रुप से मन में बैठे हुए हैं। अथवा साधक के मन में यह अभिमान आ जाए कि मैंने काम, क्रोध को जीत लिया है तो वे जीते हुए भी कष्ट देते रहते हैं क्योंकि उनके जीतने का अभिमान चित्त में बैठा हुआ है। अतः साधक को सर्वदा निरभिमानी होना चाहिए।आदिगुरुशंकराचार्य ने लिखा है, जो बुद्धिमान अपने हृदय में सब शत्रुओ को त्याग कर निव्यग्र बैठा है, वह मुक्त है और उसको ही परमात्मा समझो। जिसने अपने ह्रदय से संपूर्ण आशाओं को त्याग दिया, वह उत्तम अंतःकरण वाला समाधि लगावे या नहीं, कर्म करे या नहीं, वह सर्वथा मुक्त है। वेदांतसंदर्भ में, जिसका अहंकार रुपी दोष शांत हो गया और मन सुसमाहित है, वह योगी पूर्ण चंद्रमा की तरह शीतल भाव को धारण करता हुआ ब्रहमानंद का रसिक सच्चिदानंद ब्रह्म में सुशोभित हो रहा है। नैष्कम्र्यसिद्धि में विद्वान को आध्यात्मिक ज्ञान का अभिमान नहीं होना चाहिए, क्योंकि अभिमान आसुर गुण है। यदि सज्जनों को भी अभिमान होगा तो उसका ज्ञान निष्फल ही होगा। अतः सज्जनो को किसी प्रकार का भी मद नहीं करना चाहिए।
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