धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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सिरजनहार थें सब होइ, उत्पति परलै करै आपै, दूजा नाहीं कोई॥ आप होइ कुलाल करता, बूंद थै सब लोइ। आप कर अगोच बैठा, दुनी मन को मोहि॥ आप थै उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ। बाजीगर कौं यहु भेद आवै, सहजि सौंज समोई॥ जे कुछ कीया सु करै आपै, येह उपजे मोहि। दादू रे हरि नाम सेती, मैल कुसमल धोइ।अर्थात जगज्जन्मादि कर्ता प्रभु ही इस जगत् को अभिन्न निमित्तोपादान रूप से बनाता है। जैसे कुम्भकार घट का निर्माण करता है, वैसे ही परमात्मा स्थावरंजगम प्राणियों के शरीरों को बनाता है। मैं अकेला हूं, ऐसा संकल्प करके स्वयं ही अनेक रूप में बनकर संसारी पुरुषों के मन को अपनी माया से मोहित करके स्वयं मायारहित रहता है। प्राणियों के भिन्न-२ कर्मानुसार उन्हे भिन्न-२ फल देकर पालन करता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में-उसकी सामर्थ्य को कोई नहीं जानता। मैं तो यह सब कुछ जो है, वह परमात्मा की ही महिमा मानता हूं। हे जीव ! तुम भी परमात्मा का ध्यान करते हुए अपने मन को पवित्र बनालो तब ही ईश्वर के सामर्थ्य को जान सकोगे कि परमात्मा कैसा विलक्षण सामर्थ्य वाला है। कितने ही बुद्धिमान् लोग स्वभाव को ही कारण मानते हैं। कुछ दूसरे लोग काल को कारण मानते हैं। वास्तव में यह सब लोग मोहग्रस्त हैं क्योंकि वास्तविक कारण को जानते नहीं। वास्तव में यह परम देव परमात्मा की समस्त जगत् में फैली हुई महिमा है, जिसके द्वारा यह ब्रह्म-चक्र घुमाया जाता है।
मुण्डक में- जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती है और स्वयं ही निगल जाती है, जैसे पृथिवी में नाना प्रकार की औषधियां उत्पन्न होती हैं, जिस प्रकार जीवित मनुष्य के शरीर में केश उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्म से इस जगत् में सब कुछ पैदा होता है। उसी ब्रह्म से प्राण,मन, इन्द्रियाँ, वायु, ज्योति, जल, पृथ्वी पैदा होती है।

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