राजनीति और समाज एक दूसरे के पर्याय की तरह है। एक का प्रभाव अनिवार्य रूप से दूसरे को प्रभावित करता है। यदि समाज जागरूक व प्रगतिशील है तो राजनीति न्यायपूर्ण व विकासोन्मुख होने को मजबूर हो जाती है। देखा जाए तो समाज और राजनीति एक दूसरे से इतने गहराई से जुड़े हुए हैं, जो लगातार एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। समाज, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने के आधार पर राजनीति आकार लेती है। जबकि सरकारें अपनी नितियों, कानूनों व निर्णयों के माध्यम से सामाजिक संरचना, विकास और नागरिकों के जीवन को प्रभावित करती है। समाज के सांस्कृतिक मूल्य और मापदंड राजनीतिक व्यवहार को आकार देते हैं। राजनीति एक व्यवस्थित समाज से होती है और एक व्यवस्थित प्रभाव को निति निर्धारण के लिए राजनीति की आवश्यकता होती है। यदि आधुनिक परिवेश में देखे तो परिवार के बाद समाज का निर्माण होता है लेकिन आजकल एकल परिवारों ने सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने का काम किया है। किसी भी समाज की प्रगति उसकी युवा पीढ़ी पर निर्भर करती है लेकिन युवा पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में सांस्कृतिक मूल्यों से विमुख हो गए व संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार हो गये, हमारे की प्रवृति मेरे में तब्दील हो गई। इसी संदर्भ में देश की राजनीति भी संक्रमण काल से गुजर रही है, समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने की राजनीति हो गई। राजनीतिक मूल्य रसातल में चले गये, अपने निजी महत्वकांक्षा के कारण समाज में दरारें पैदा करने का काम हो रहा है। यह उसी संकीर्ण मानसिकता की राजनीति का परिचायक था कि इस राजनीति ने यूजीसी रेगुलेशन एक्ट को लाकर सामाजिक समरसता नष्ट करने की नाकाम कोशिश की लेकिन समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने अपनी चेतना का परिचय दिया और मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में लेकर गए और इसी जागरूक समाज के प्रबुद्धजनो के प्रयासों से माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्टे दे दिया। जबकि समाज के राजनेताओं ने अपनी कुर्सी को प्राथमिकता दी और इस बिल के विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला। उनकी चुप्पी इस बात की तरफ इशारा करती है कि कुर्सी समाज से बड़ी हो गई। यही आधुनिक राजनीति व सामाजिक सरोकार का एक ज्वलंत उदाहरण है कि किस तरह राजनीति के कानून सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करते हैं।
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