राजस्थान के प्रशासनिक गलियारों में छाई यह बेचैनी और गहमागहमी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य सरकार नौकरशाही के ढांचे में एक बड़ी सर्जरी के अंतिम चरण में है। इसी साल के शुरुआती दिन से प्रभावी हुई पदोन्नति की सूची ने न केवल अधिकारियों के रैंक में इजाफा किया है, बल्कि सचिवालय की पूरी कार्यप्रणाली को पुनर्गठित करने का अवसर भी दिया है। इस बदलाव की सबसे बड़ी चुनौती उन रिक्तियों को भरना है, जो हाल ही में शीर्ष स्तर के अधिकारियों की सेवानिवृत्ति से पैदा हुई हैं। दिसंबर 2025 में सुबोध अग्रवाल जैसे अनुभवी अतिरिक्त मुख्य सचिव की सेवानिवृत्ति और कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद कई महत्वपूर्ण विभाग नेतृत्व के संकट से जूझ रहे हैं। इसके अतिरिक्त, शुभ्रा सिंह जैसी वरिष्ठ अधिकारी की आगामी सेवानिवृत्ति ने सरकार को मजबूर कर दिया है कि वह रोडवेज जैसे निगमों के लिए अभी से एक स्थाई और समर्पित उत्तराधिकारी की तलाश पूरी करे। सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों द्वारा खाली की गई इन कुर्सियों को भरने के लिए अब 1996 बैच के उन चार नए नवेले अतिरिक्त मुख्य सचिव यथा अजिताभ शर्मा, आलोक गुप्ता, दिनेश कुमार और राजेश कुमार यादव पर भरोसा जताया जा रहा है। वर्तमान में स्थिति यह है कि सचिवालय के गलियारों में फाइलों की आवाजाही 'अतिरिक्त प्रभार' के बोझ तले दबी हुई है। अखिल अरोड़ा के पास मुख्यमंत्री कार्यालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ साथ जलदाय विभाग जैसे जन सरोकार वाले विभाग का अतिरिक्त जिम्मा होना, या मंजू राजपाल और श्रेया गुहा जैसे अधिकारियों का एक साथ कई निगमों और विभागों को संभालना, प्रशासनिक गति को धीमा कर रहा है। सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों की भरपाई न हो पाने के कारण यह 'वर्कलोड' अब अपनी चरम सीमा पर है, जिससे नीतिगत निर्णयों में देरी हो रही है। यही कारण है कि 28 जनवरी से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से पहले इन विभागों में नियमित पदस्थापन को अपरिहार्य माना जा रहा है, ताकि सदन में विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए हर विभाग के पास एक पूर्णकालिक प्रशासनिक मुखिया मौजूद हो। यह फेरबदल केवल सचिवालय तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर जिला स्तर पर भी देखने को मिलेगा। भले ही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के चलते 15 फरवरी तक कलेक्टरों के तबादलों पर तकनीकी रोक है, लेकिन जितेन्द्र कुमार सोनी और इन्द्रजीत सिंह जैसे अधिकारियों की सचिव पद पर पदोन्नति ने यह साफ कर दिया है कि जयपुर और जोधपुर जैसे महत्वपूर्ण जिलों में नए चेहरों की एंट्री जल्द होगी। सेवानिवृत्ति से हुए अनुभव के नुकसान को इन पदोन्नत अधिकारियों की कार्यक्षमता से संतुलित करना ही इस पूरी कवायद का मूल मंत्र है। कुल मिलाकर, आने वाले कुछ दिनों में निकलने वाली तबादला सूची राजस्थान की नौकरशाही में 'तदर्थवाद' के दौर को समाप्त कर एक नई और स्थाई प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखेगी, जो आगामी निकाय चुनावों और बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन में निर्णायक भूमिका निभाएगी। रोडवेज की चेयरमैन शुभ्रा सिंह इसी माह सेवानिवृत हो जाएगी। जन्मतिथि के हिसाब से उनकी सेवानिवृति 1 फरवरी 26 को होनी चाहिए लेकिन नियमो के मुताबिक किसी अधिकारी की जन्मतिथि 1 या 2 तारीख होती है तो उसे पहले ही सेवानिवृत कर दिया जाता है। किसी अधिकारी की जन्मतिथि 3 तारीख है तो उसकी सेवानिवृति महीने के अंत मे होने का प्रावधान है।
*महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार*