पंचायत चुनाव की आहट के साथ ही गांवों की चौपालें एक बार फिर राजनीति के रंग में रंगने लगी हैं। बरसों से शांत पड़ी ये चौपालें अब चर्चा, बहस और राजनीतिक चकल्लस का केंद्र बन चुकी हैं। वार्ड पंच से लेकर सरपंच, उप-सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और प्रधान तक—हर पद पर संभावनाओं की गणित बैठाई जा रही है। सुबह की कड़क ठंड हो या दोपहर की गुनगुनी धूप, चौपाल पर बैठकी टूटती नहीं, साथ ही राजनीति का विचार–विमर्श पूरे जोश में चलता है। गांव की राजनीति किसी पार्टी के झंडे या चिन्ह की मोहताज नहीं होती। यहां चौपाल पर बैठा हर व्यक्ति खुद को ही एक संपूर्ण राजनीतिक दल मानकर चलता है और हर मुद्दे पर अपने तर्क पूरे आत्मविश्वास के साथ पेश करता है। चौपाल की बहसों में अनुभव भी बोलता है और भावनाएं भी। कोई पिछली पंचायत की विफलताओं को गिनाता है तो कोई आने वाले पांच सालों के सपनों का खाका खींचता है। पानी, सड़क, बिजली, शिक्षा, रोजगार—हर विषय पर खुली बहस होती है। कोई खुद को भावी सरपंच के रूप में देखता है तो कोई प्रधान की कुर्सी पर बैठकर पूरे गांव का भविष्य तय करता नजर आता है। यहां कोई औपचारिक मंच नहीं, न ही भाषण की तय समय-सीमा। जो मन में है, वही जुबान पर है। तर्क के साथ प्रतितर्क चलता है, समर्थन के साथ विरोध भी। कभी हंसी-ठिठोली, तो कभी तीखी नोक झोंक लेकिन सब कुछ लोकतंत्र की मर्यादा के भीतर। यही चौपाल की ताकत है, यही इसकी पहचान। असल में गांव की चौपालें ही लोकतंत्र की असली प्रयोगशाला हैं, जहां आम आदमी बिना लाग-लपेट अपनी राय रखता है और सत्ता के सपनों को शब्दों का आकार देता है। पंचायत चुनाव नजदीक आते ही ये चौपालें न सिर्फ राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जाती हैं, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र में नई चेतना और नई ऊर्जा का संचार भी करती हैं। चौपाल तो आखिर चौपाल है-अगर जमेगी नहीं तो लोकतंत्र बोलेगा कैसे।
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