राजनीति बनाम राजधर्म

AYUSH ANTIMA
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राजनीति के मुख्य तीन कारक होते हैं सत्ता, शक्ति और शासन की कला और राजधर्म के मुख्य स्तंभ है राजा या शासक का कर्तव्य, नैतिक और कल्याणकारी शासन। राजनीति जहां सत्ता प्राप्ति व उसके उपयोग पर केन्द्रित है, वही राजधर्म में नैतिक मूल्यों, करूणा व प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि रखा जाता है। राजधर्म राजनीति का वह सर्वोच्च स्वरूप है, जो सत्ता को सेवा और जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं। राजनीति का मुख्य फोकस होता है सत्ता प्राप्त करना। अक्सर सत्ता के जोड़ तोड़, रणनितियो और तात्कालिक लाभ पर राजनीति केन्द्रित होती है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा था, प्रजा सुखे सुखं राज्ञ:, प्रजानां चाहिते हितम, नात्याम प्रियं राज्ञ: प्रजानां तु प्रिय प्रियम।। अर्थात प्रजा के सुख में ही राजा का सुख होता है, प्रजा के हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय (स्वार्थ) कुछ नहीं होता, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है। अब आज के परिदृश्य में देखे तो राजनीति सत्ता प्राप्ति होते ही शक्ति आ जाना लेकिन यह शक्ति जब शासक को निरंकुश बनाने के साथ ही जब सत्ता का घमंड हो जाता है तब राजधर्म गोण हो जाता है। भारतीय राजनीति केवल स्वार्थ की राजनीति पर केन्द्रित हो गई है। सत्ता प्राप्ति ही राजनेताओं का मुख्य उद्देश्य हो गया। सत्ता के लिए जिस तरह से बंदर डालो पर उछल कूद करता है, उसी प्रकार इस दल से उस दल के दरवाजे पर याचक बनकर पहुंच जाते हैं। जोड़ तोड़ कर सत्ता हासिल करने वाले को आधुनिक चाणक्य कहकर महिमान्वित करते हैं, जबकि उनको यह पता नहीं कि चाणक्य ने सत्ता को स्वार्थ की राजनीति नहीं माना लेकिन भारतीय राजनीति संक्रमण काल से गुजर रही है। कुर्सी ही राजनेताओं का राजनीति करने का मुख्य उद्देश्य हो गया है। बातें तो जनहित की होती है लेकिन जनहित की आड़ में निहितार्थ राजनीति में आते हैं। राजधर्म केवल किताबी शब्द हो गया है।

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