मैं हूं स्वयंभू अध्यक्ष

AYUSH ANTIMA
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स्वयंभू अध्यक्ष वह प्रजाति का प्राणी है, जो खुद ही अपना चुनाव करता है, खुद ही शपथ लेता है और खुद ही अपनी तारीफ के कसीदे पढ़कर खुद को महिमा मंडित करता है। इसी बीमारी से ग्रसित हमारे मौहल्ले में मौहल्ला विकास समिति के स्वयंभू अध्यक्ष हैं। उन्होंने केवल एक बार चुनाव लडा और जमानत जब्त करवाकर बैठ गये, फिर उनका चुनावों पर से विश्वास ही उठ गया और खुद को स्वयंभू अध्यक्ष बनने की घोषणा कर दी व उस मिटिंग में ताली बजाने वाले भी अध्यक्ष के ही थे। अब यदि अध्यक्ष जी से मौहल्ले की समस्या लेकर जाते है तो बड़े सहज भाव से कहते हैं कि समस्या का होना ही विकास का लक्षण है और यह नसीहत देकर अपनी लग्जरी गाड़ी में फुर्र हो जाते हैं। स्वयंभू अध्यक्ष की यह सबसे बड़ी खूबी है कि वह किसी को बोलने का मौका नहीं देते। खुद ही प्रश्न कर उत्तर देना उनकी विशेषताओं में से एक खूबी है। मिडिया वाले भी उन्हीं के होते हैं क्योंकि उन पर स्वयंभू अध्यक्ष की खास मेहरबानी होती है। यही कारण है कि समाचारों में स्वयंभू अध्यक्ष जी का गुणगान कर उचित स्थान दिया जाता है। यदि स्वयंभू अध्यक्ष से हिम्मत करके कोई सवाल पूछ भी ले तो वह विकास विरोधी होने के साथ ही अराजकता की श्रेणी में आ जाता है। कहने का मतलब है कि स्वयंभू अध्यक्ष खुद ही न केवल नर्तक है बल्कि खुद ही दर्शक भी है। देखा जाए तो राजनीति एक धंधा हो गया। जिस तरह से बिजनेस कैरियर, मिलिट्री कैरियर या एज्युकेशन कैरियर होता है, वैसे ही पोलिटिकल कैरियर भी आ गया है। स्वयंभू अध्यक्ष को यह भी पता है कि 150 रूपये की शाल व माला पर 200 रूपये खर्च करके किसी भी नेता या मंत्री का सम्मान कर फिर खुद को सोशल मीडिया पर गौरवान्वित करना कि स्वयंभू अध्यक्ष ने अमुक मंत्री या नेता से क्षेत्र की समस्याओं व संगठनात्मक ढांचे पर गंभीर चर्चा की। यदि उनके सम्मान में कोई आयोजन किया जाए तो अध्यक्ष के ही लोगों को निमंत्रण दिया जाता है क्योंकि वही सम्मानित जनमानस की श्रेणी में आते हैं, जिनसे मंच की शोभा बढ़ती है। ऐसे आयोजनों में देरी का कारण वह स्वयंभू अध्यक्ष ही होता है, जो देर से पहुंचता है क्योंकि इंतजार करना आयोजकों की विवशता होती है कि आयोजन का सारा खर्च स्वयंभू अध्यक्ष की जेब से ही होता है। इस स्वयंभू अध्यक्ष के गुणों में इन्हें पद के लिए किसी चुनाव की जरुरत नहीं होती है। ये सुबह उठते है और आईना देखकर खुद को स्वयंभू अध्यक्ष घोषित कर देते हैं। यह इतनी भाषणवीर प्रजाति होती है कि माईक मिलते ही उनकी आत्मा जागृत हो उठती है। विषय चाहे कुछ भी हो लेकिन खुद के गुणगान और अपनी उपलब्धियां ही बतायेंगे। ऐसे स्वयंभू अध्यक्ष के लिए भी संस्था या संगठन एक साधन है और खुद साध्य है। वे न तो किसी की सुनते हैं और न किसी की मानते हैं। आखिर स्वयंभू का मतलब तो यही है कि जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो और स्वयं ही विलीन हो जाए।

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