साधु-संतो और जनता के बूते गोचर आन्दोलन ने ली करवट-हेम शर्मा

AYUSH ANTIMA
By -
0


गोचर आन्दोलन की शुरुवात पर गौर करें तो कई दिग्गज आगे आए। बीकानेर से भाजपा विधायकों ने मुख्यमंत्री को लिखित में दिया कि गोचर यथावत रहे। भाजपा के जोधपुर सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बीकानेर गोचर के साथ अपना ताल्लुकात बताते हुए कहा था कि यह कायम रहनी चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया ने इसी बात कि वकालत की और मुख्यमंत्री से बात करने का आश्वासन दिया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन सिंह राठौड़ ने भी जनता की आवाज के साथ अपनी आवाज मिलाई। भाजपा के वरिष्ठ नेता देवी सिंह भाटी ने भी जमकर समर्थन किया। केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने प्रारंभ में कहा कि पता करेंगे कि जहां पहले विकास प्राधिकरण बने हैं वहां क्या हुआ। वे मुख्यमंत्री से बात करेंगे। बताया जाता है संघ के कुछ पदाधिकारियों ने भी गोचर मुद्दे पर समर्थन जताया था। आरएलपी के सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी बीकानेर में कहा था कि गोचर मुद्दे पर वे संघर्ष में जनता के साथ है। कांग्रेस के नेता डा. बी.डी.कल्ला समेत अन्यों ने गोचर आन्दोलन कर समर्थन किया। इनमें से सभी नेताओं ने मात्र बयान देने तक भागीदारी निभाई। अब गोचर आन्दोलन विशुध्द रूप से जनता और साधु संतों के सक्रिय भागीदार में है। पहले बोले कोई नेता न तो अपनी बात दोहरा रहे है और न ही आन्दोलन की सक्रिय भूमिका में आ रहे हैं। आन्दोलन की ये शुरूवाती शिलाएं सिसक गई है। हालांकि इनकी चुप्पी जन भावना के साथ जरूर मानी जा रही है। इनकी नजर इस बात पर टिक है कि इस मुद्दे पर ऊंट किस करवट बैठेगा ? 
इस बीच गाय और गोचर के इस मुद्दे ने ऐसी करवट ली कि देश भर से साधु संत गोचर आन्दोलन से जुड़ गए। यह मुद्दा जन जन की जुबान बन गया। लोग बढ़-चढ़कर इस मुद्दे पर सक्रियता दिखा रहे हैं। बीकानेर गोचर रियासतकाल में दानदाता साहूकारों की ओर से खरीदकर गायों की चराई के लिए दान दी गई है। इसके दस्तावेज गोचर आन्दोलनकारियों के पास है। जो प्रशासन और सरकार को भी उपलब्ध है। जनता और साधु संतों का सरकार और प्रशासन से एक ही सवाल है कि गायों के लिए दान की गई जमीन पर सरकार या बीकानेर विकास प्राधिकरण का क्या हक है ? मुद्दे की इस तह तक जाने को कोई तैयार ही नहीं है। विकास प्राधिकरण के लिए जो भी कानून बना उसमें इस तरह खरीदकर दान दी गई गोचर को अधिग्रहण का प्रावधान है क्या ? पहला दान दी गई गोचर। फिर गोचर के प्रति जनास्था और लोक मान्यताएं। तीसरा गोचर की प्रकृति, पर्यावरण और पारिस्थितकी तंत्र ऐसा मजबूत आधार है कि जनता कि यह आवाज दबा पाना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए आसान बात नहीं हो सकती। 
केन्द्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार के सामने साधु संत इस मुद्दे पर आगे है। जनता का कितना समर्थन है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। सवाल यह है कि क्या भाजपा सरकार साधु संतों की गोचर को लेकर उठाई गई मांग को अनदेखा कर सकती है ? अगर ऐसा होता है तो इसका भाजपा की भावी राजनीति पर देशभर में क्या हश्र होने वाला है। यह समझने की बात है। यह सच्च है कि राजस्थान में भाजपा के मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर सीधे रूप से साधु-संतों और जनता के सामने कुछ नहीं बोल पा रहे हैं। इसी से सरकार के प्रति भी जनाक्रोश और संतों की नाराजगी बढ़ती जा रही है। इस मुद्दे पर क्षेत्र के भाजपा के नेता भले ही अपने वक्तव्य को दुबारा इस आन्दोलन के समर्थन में नहीं दोहराएं, परन्तु वे अपने दिए वक्तव्य को झुठलाकर जन भावना से बाहर नहीं जा सकते। नजर इस बात पर टिकी है कि इसकी परिणित क्या होती है। सरकार झुकी तो श्रेय लेने में नेता आगे जरूर रहेंगे। भले ही अभी चुप्पी साधे हो। गोचर के लिए अभी कड़े संघर्ष का समय है। देखा यह जा रहा है कि गोचर का नया इतिहास रचने में कौन भूमिका निभा रहे हैं?

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!