मुख्यमंत्री के क्षेत्र में मच रही है खुली लूट: कागजी मुर्दों का जबरदस्त 'नंगा नाच'

AYUSH ANTIMA
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​जयपुर में आज अपना घर बनाना सबसे महँगा सपना नहीं, बल्कि सबसे बड़ा जोखिम बन चुका है। जिस 'सहकारिता' शब्द का अर्थ 'साथ मिलकर विकास' था, उसे जयपुर के भू-माफियाओं ने 'संगठित डकैती' का पर्यायवाची बना दिया है। कागजों पर सहकारी समितियाँ हैं, लेकिन जमीन पर 'ब्लैक मनी' और 'रसूख' का ऐसा खूनी खेल है, जिसे 'भू-माफिया मॉडल' कहना भी अब छोटा शब्द लगता है।

*​सत्ता की नाक के नीचे 'अवैध' का उत्सव*

​विडंबना देखिए, राजधानी जयपुर से लेकर मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र तक में अवैध कॉलोनियों का जाल धड़ल्ले से बिछाया जा रहा है। समूचा प्रशासनिक तंत्र 'धृतराष्ट्र' बना बैठा है। जांच बताती है कि जयपुर की 82 अवैध कॉलोनियों के जरिए करीब 50,000 करोड़ रुपये का महा-घोटाला अंजाम दिया जा चुका है। यह सिर्फ जमीन का हेरफेर नहीं है, बल्कि मध्यमवर्गीय परिवारों के खून-पसीने की कमाई की 'सुपारी' है।

*​कागजी मुर्दे... जमीन पर जिंदा!*

​सबसे वीभत्स सच यह है कि जिन समितियों का पंजीकरण वर्षों पहले खत्म हो चुका है, जिनका कानूनी वजूद मिट्टी में मिल चुका है, वे आज फिर 'पुनर्जीवित' होकर शिकार पर निकली हैं।

*​पुराना खेल, नये चेहरे*

फौजी, राजहंस, झालाना डूंगरी, प्रताप नगर, सायवाड और हथरोई गढ़ी जैसी दर्जनों समितियाँ आज कानून की छाती पर मूंग दल रही हैं।

*​लूट का नायाब तरीका*

निजी जमीनों पर अवैध ले-आउट, एक ही प्लॉट के कई-कई फर्जी पट्टे और तो और... सड़क, पार्क, नाला यहाँ तक कि श्मशान-कब्रिस्तान जैसी सार्वजनिक जमीनों को भी बेचकर सरकार को ठेंगा दिखाया जा रहा है।

*​सिस्टम की 'मूंगफली' और अफसरों की 'सेटिंग'*

​सहकारिता विभाग की पंजीयक आनंदी को सारे तथ्य परोसे जा चुके हैं, लेकिन मजाल है कि विभाग की तन्द्रा भंग हो जाए। अफसरों की अकर्मण्यता सरकार की साख का जनाजा निकाल रही है। ​दूसरी ओर जेडीए (जयपुर विकास प्राधिकरण) की भूमिका किसी 'अपराध में साझीदार' से कम नहीं है।

*​सतर्कता का सन्नाटा: सतर्कता* 

आईजी राहुल कोटकी सब जानकर भी अनजान हैं। जो काम पहले एक एडिशनल एसपी स्तर का अधिकारी कर लेता था, आज आईजी की मौजूदगी में भी वह काम ठप है। फिर इस पद का औचित्य क्या है ? आईजी की जगह एडिशनल एसपी से काम नही चलाया जा सकता है ? पिछले छह-आठ महीनों में अवैध कालोनियों का कारोबार जबरदस्त तरीके से फल-फूल रहा है । जबकि सतर्कता शाखा का वही बुलडोजर चलता है, जहां सेटिंग हो नही पाती । 

*​पोस्टिंग का बाजार*

सूत्रों की मानें तो JDA की सतर्कता शाखा में एक पुलिस निरीक्षक की कुर्सी की 'बोली' करीब 10 लाख रुपये तक लगती है। सवाल है कि इतनी भारी कीमत देकर पोस्टिंग पाने वाला अफसर क्या माफिया के खिलाफ बुलडोजर चलाएगा या उनके लिए 'सुरक्षा कवच' बनेगा?

*​रेरा: एक 'संवैधानिक अपंग'*

राजस्थान रियल एस्टेट रेगुलर अथॉरिटी ​(रेरा) जैसा नियामक आज एक असहाय मूकदर्शक है। माफियाओं ने सहकारिता का नकाब ही इसलिए पहना है ताकि वे रेरा के चाबुक से बच सकें। सरकार ने संस्था तो बना दी, लेकिन उसे अधिकार के नाम पर *'बाबा जी का ठुल्लू' थमा दिया।*

*​सरकार की चुप्पी: सहमति या विवशता?*

​इसी जयपुर में कभी जेडीए और सहकारिता विभाग होर्डिंग लगाकर चिल्लाते थे कि *"सहकारी समिति से प्लॉट खरीदना गैरकानूनी है, जेल हो सकती है।"* आज न वो होर्डिंग हैं, न वो चेतावनी। आज तो सिर्फ अफसरों की मेज पर 'मूंगफली' है और माफियाओं के साथ 'चीयर्स' का शोर।

​भैरोसिंह शेखावत का वो दौर याद आता है, जब नियम तोड़ने वाली समितियों के रसूखदार पदाधिकारी जेल की सलाखों के पीछे होते थे। आज की सरकार 'शेखावत फॉर्मूले' से क्यों कतरा रही है? क्या सत्ता भू-माफियाओं के आगे नतमस्तक है?

*​अंजाम: बर्बादी की दहलीज पर आम आदमी*

​सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक और नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा के संज्ञान में पूरी कुंडली है। लेकिन हस्तक्षेप के नाम पर सन्नाटा पसरा है। मंत्री और अफसरों की इस 'सामूहिक चुप्पी' ने माफियाओं को वह कवच दे दिया है, जिसे भेद पाना अब आम आदमी के बस की बात नहीं।

*एसीबी का औचित्य*

भ्रस्टाचार निरोधक ब्यूरो का औचित्य इसलिए समझ नही आता है क्योंकि लीपापोती के अलावा इस विभाग के पास कोई काम नही है । क्यो नही यह विभाग जेडीए या सहकारी विभाग के उन अफसरों की गर्दन नापता जिनके संरक्षण और मिलीभगत से जमीनों की लूट-खसोट हो रही है । 

*​निचोड़*

आज जयपुर में सवाल यह नहीं है कि ये कॉलोनियाँ अवैध क्यों हैं। सवाल यह है कि किसके 'वरदहस्त' से ये फल-फूल रही हैं? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक जयपुर का हर नया घर एक 'संभावित मलबा' है। याद रहे, जब कल को सरकारी बुलडोजर चलेगा, तो न नेता आएगा, न भ्रष्ट अफसर और न ही वो माफिया—बचेगा तो सिर्फ वो आम आदमी, जिसकी आंखों में अपनी जीवनभर की कमाई लुटने का मंजर होगा।

*​सरकार जाग रही है या हिस्सेदारी निभा रही है, जयपुर जवाब चाहता है: महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार*

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