चौपाल आज़ भी बुजुर्गों की स्मृतियों और अनुभवों की साक्षी है। पिछले सप्ताह गांव की चौपाल पर बैठे बुजुर्गों की बातचीत ने आज के ग्रामीण यथार्थ की एक जीवंत तस्वीर सामने रखी। चौपाल की चर्चाओं में आज़ युवाओं की मौजूदगी कम नहीं है, पर उनकी आंखों में वह ठहराव अब दिखाई नहीं देता, जो कभी गांव की पहचान हुआ करता था। कोई युवा मोबाइल की चमकती स्क्रीन में उलझा है, कोई शहर की राह ताक रहा है, तो कोई सरकारी नौकरी के फार्म भरते-भरते भीतर से टूट चुका है। विडंबना यह है कि गांव का युवा हर चर्चा का केंद्र है, लेकिन उसकी आवाज सबसे कम सुनी जाती है। कभी यही युवा खेती, पशुपालन और गांव की सामाजिक व्यवस्था की मजबूत रीढ़ हुआ करता था। परिवार की आजीविका से लेकर सामुदायिक जिम्मेदारियों तक, उसकी भूमिका निर्णायक होती थी। खेतों की मेड़ों से लेकर सामाजिक कार्यों में उसकी भागीदारी गांव को जीवंत बनाए रखती थी। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। शिक्षा पूरी होते ही युवा के मन में पहला सवाल यही उठता है—“गांव में रखा ही क्या है।” गांव में रोजगार, प्रशिक्षण और आगे बढ़ने के अवसर सीमित नजर आते हैं। परिणामस्वरूप युवा या तो शहरों की ओर पलायन करता है या फिर गांव में रहकर भी दिशाभ्रम और असंतोष का शिकार हो जाता है। सपनों और हकीकत के बीच की यह दूरी उसके आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खोखला कर देती है।
चौपाल पर बैठे बुजुर्ग अनुशासन, परंपरा और संस्कारों की सीख तो देते हैं, लेकिन युवाओं के बदलते सवालों के ठोस और व्यावहारिक जवाब देने वाली व्यवस्था कहीं दिखाई नहीं देती। स्वरोजगार, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता से जुड़ी सरकारी योजनाएं कागजों में तो मौजूद हैं पर उनकी सही जानकारी, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन का अभाव आज भी गांव की सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है। अवसर और जरूरत के बीच की यही दूरी युवाओं में निराशा और असंतोष को जन्म देती है। यह स्वीकार करना होगा कि युवा गांव की समस्या नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति और समाधान है। आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं को केवल उपदेश न देकर उन्हें गांव की निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए। यदि गांव में ही स्थानीय उद्यमिता, आधुनिक कृषि, पशुपालन और डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा मिले, तो युवा गांव छोड़ने के बजाय गांव को संवारने का सपना देख सकता है। आज जरूरत है कि गांव की चौपाल केवल बैठने की जगह न रहकर संवाद, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन का केंद्र बने, तभी युवा को गांव में ही सम्मानजनक भविष्य दिखाई देगा। अन्यथा गांव का भविष्य हर सुबह शहरों की ओर जाने वाली बसों में बैठकर धीरे-धीरे गांव से बाहर निकलता रहेगा।