भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है जबकि देश में पीने योग्य जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत भाग ही उपलब्ध है। देश में अत्यधिक जल दोहन तथा अकुशल प्रबंधन के कारण जल स्तर में निरंतर गिरावट देखने को मिली है। वैश्विक जल गुणवता सूचकांक में भारत का स्थान बहुत ही चिंताजनक है, जहां 122 देशों मे से भारत 120वे स्थान पर है। भारत के लगभग 70 प्रतिशत जलस्त्रोत प्रदूषित है, जिससे देश को शुद्ध जल को लेकर गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। यह रैंकिंग निजी आयोग की रिपोर्ट और विभिन्न अध्ययनों पर आधारित है, जो जल प्रदूषण और सुरक्षित पानी तक पहुंचने की कमी को दर्शाती है, 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुने होने का अनुमान है। देश की सभी सरकारें विकास व जनकल्याण के बहुत दावे करती आई है। भारत विश्व गुरू बनने की ओर अग्रसर है। देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और आमजन को मूलभूत सुविधाओं में शुद्ध पेयजल उपलब्ध न करवाना सरकारी दावों की पोल खोल रहा है। पर्यावरण को लेकर हम रोजाना वायु प्रदूषण को मापते हैं, हीटवेव को लेकर भी आमजन को आगाह किया जाता है लेकिन जब पीने का पानी जानलेवा बन जाता है तो ऐसी साधारण प्रतिक्रिया आती है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। इंदौर में हाल ही में दूषित जल से हुई मौतें कोई अपवाद नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता का लक्षण भी है। दूषित पेयजल के पीने से 2005 से 2022 के बीच तीव्र दस्त, हैजा, टाईफाइड जैसी जलजनित बीमारियों से 20.98 करोड़ के मामले दर्ज किए गये, उनमें से लगभग 50 हजार से अधिक मौते हुई। इन मौतों के बावजूद भी पेयजल की गुणवत्ता, सुरक्षित व शुद्ध पेयजल राजनीतिक प्राथमिकता नहीं बन पाती है। देखा जाए तो इस दूषित जलस्त्रोतो की जड़ वह मार्ग भी है, जिसके जरिए पानी घरों तक पहुंचता है। यह भी देखा गया है कि सीवर लाइन का पानी पेयजल की पाइपों में मिल जाता है और स्थानीय प्रशासन आंखें मूंदकर बैठा रहता है। स्थानीय निकाय ही इस मामले में पहली सीढ़ी है और वही जांच और तय करती है कि घरों तक शुद्ध पेयजल नलों के माध्यम से पहुंच रहा है। सरकार ने जिस तरह खाद्य सुरक्षा गारंटी लागू की है, उसी प्रकार शुद्ध पेयजल के अधिकार के बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा। दूषित पेयजल संकट से निपटने के लिए हादसे के बाद तात्कालिक उपाय करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत उस सिस्टम को बनाने की है, जो समस्या पैदा होने से पहले ही उपचार करें। अमृत 2.0 योजना के तहत हर घर में नल जल को प्रभावी बनाने व नलों में शुद्ध पेयजल मिले इस पर जोर देना होगा। इसको जनहित या कल्याणकारी मुद्दे की दृष्टि से देखने के बजाय संवैधानिक दायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। देश के जल संकट के समाधान के लिए सरकार द्वारा किए गये प्रयासों के अतिरिक्त जन सहयोग भी अपेक्षित है। इसके लिए जन जागरण बढ़ाने के साथ ही भूजल प्रबंधन, कुशल सिंचाई प्रावधान एवं वर्षा जल संचयन जैसे उपायों को अपनाकर भविष्य के जल संकट को कम किया जा सकता है क्योंकि जल है तो कल है।
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