यदि भाजपा सरकारों की बात करें तो अपवाद के रूप मे स्वर्गीय काका सुंदरलाल को छोड़कर झुन्झुनू जिले को सरकार में भागीदारी को लेकर भाजपा ने अछूत ही समझा है। कांग्रेस सरकार ने जरूर इस जिले को तवज्जो दी है। अब भजन लाल शर्मा सरकार मे मंत्रिमंडल में फेरबदल को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। राजनीतिक विश्लेषक अपने अपने हिसाब से इसका मंथन कर रहे हैं। यदि बचे हुए तीन साल में झुंझुनूं जिले को सरकार में भागीदारी देने की सोच रहे हैं तो झुंझुनूं विधायक राजेन्द्र भांभू का नाम सर्वोपरि है। विधानसभा उपचुनावों में रिकार्ड जीत ही दर्ज नहीं की लेकिन भांभू ने ओला परिवार के अजेय गढ़ को ध्वस्त भी किया था। गुटबाजी के भंवर में फंसी भाजपा व विरोध के स्वर होने के बावजूद राजेन्द्र भांभू ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। अब यदि मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा अपने मंत्रिमंडल में राजेन्द्र भांभू के रूप में झुंझुनूं जिले को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चित रूप से आगामी पंचायत व नगर निकाय चुनाव में भाजपा के लिए शुभ संकेत हो सकते हैं। इसी संदर्भ में संगठन की बात करें तो मदन राठौड़ ने अपनी टीम में दो नेताओं को जगह दी है। इनमें से एक मुकेश दाधीच लंबे समय से अपनी जगह ओर पकड़ बनाए हुए हैं। झुंझुनूं जिले के पुर्व भाजपा जिलाध्यक्ष डाक्टर दशरथ सिंह शेखावत को प्रवक्ता की जिम्मेदारी सौंपी है। विदित हो झुंझुनूं जिला कांग्रेस का गढ़ रहा है और पिछले विधानसभा चुनावों में भी कोई अप्रत्याशित परिणाम भाजपा को देखने को नहीं मिले थे। यदि देखा जाए तो किसी राजनीतिक दल में संगठन में पद मिलना कोई बड़ी बात नहीं होती बल्कि अपने पद पर बने रहते हुए आमजन से जुड़ाव व जनता के बीच अपनी पार्टी का विश्वास मजबूत करने के साथ ही संगठन में मची गुटबाजी व धड़ेबाजी पर लगाम लगाना भी है। सर्किट हाउस में बैठकर चंद लोगो से फीडबैक लेने के बजाय पार्टी के अंतिम छोर के कार्यकर्ता से जुड़ाव होने एक अच्छे संगठन कर्ता की निशानी होती है। संगठन व सरकार में जगह देना भाजपा के प्रदेश व शीर्ष नेतृत्व का विशेषाधिकार है लेकिन किसी जिले को सरकार में भागीदारी से वंचित रखना भाजपा के लिए कोई शुभ संकेत नहीं जबकि जिले में पहले ही भाजपा खस्ता हालत में है।
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