मन बावरे हो, अनत जनि जाइ।
तो तूं जीवै अमी रस पीवै, अमर फल काहे न खाइ॥ रहु चरण शरण सुख पावै, देखहु अघाइ। भाग तेरे पीव नेरे, थीर थान बताइ॥ संग तेरे रहै धेरै, सहजै अंगि समाइ। सरीर माहीं सोध साई, अनहद ध्यान लगाइ॥ पीव पास आवै सुख पावै, तन की तपत बुझाइ। दादूरे जहं नाद ऊपजै, पीव पास दिखाइ। अर्थात हे पागल मन ! तू प्रभु को छोड़कर अन्यत्र आसक्त क्यों हो रहा है। भक्तिरूपी अमृत का पान करके ही तू जीवित रह सकता है। अत: प्रभु का भजनरूपी अनुभव अमृत को क्यों नहीं पीता। प्रभु के शरण में जाकर वहाँ ही स्थित रहकर ज्ञान नेत्रों से उस प्रभु को देख तब ही परमानन्द की प्राप्ति होगी। तेरे भाग्य से प्रभु भी तेरे पास ही है। विशेषरूप से वे अष्टदलकमल में विराजते हैं। वह परमात्मा तेरे को चारों तरफ से तेरे शरीर को आवृत करके रहते हैं। अनाहत नाद के द्वारा उनको खोज। सर्वोपनिषत्सारसंग्रह में अनाहत शब्द की जो ध्वनि है, उस ध्वनि के मध्य एक ज्योति है और उस ज्योति के मध्य में जब मन चला जाता है और वहीं पर लीन हो जाता है वह ही भगवान् विष्णु का परमधाम है। निरन्तर नादानुसंधान से वासना क्षीण हो जाने के कारण मन और प्राण निरंजन ब्रह्म में लीन हो जाते हैं।