अंग्रेजी मानसिक गुलामी मिटाने की पहल*

AYUSH ANTIMA
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15 अगस्त सन् 1947 को देश आजाद तो हुआ लेकिन मानसिक गुलामी के चिन्ह आज भी कायम है। इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्रीय सरकार ने सकारात्मक पहल की है कि अब प्रधानमंत्री कार्यालय सेवा तीर्थ व राजभवन लोक भवन के नाम से जाना जायेगा। इसको लेकर आम चर्चा भी है कि नाम बदलने से क्या हासिल होगा। इसका एक बहुत ही सार्थक जबाब है कि नाम बदलना उस औपनिवेशिक आत्मा से मुक्ति का अनुष्ठान है, जो आजादी के बाद भी हमारी मानसिकता पर हावी है। ऐसा नहीं अंग्रेजों ने देश पर हुकूमत करके गुलाम बनाया बल्कि मानसिक रूप से गुलाम करने का भी काम किया। अंग्रेज खुद को शासक व जनता को एक तरह से खुद की गुलामी में ग्रस्त माना। अब यदि पीएमओ का नामकरण सेवा तीर्थ होता है तो सत्ता के गलियारे में बैठे नेताओं व अफसरों को भान होना चाहिए कि वे मालिक नहीं जनता के सेवक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मानसिकता की इन बेड़ियों को तोड़ने की पहल की है, उसका स्वागत होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल को राजनीतिक चश्मे के बजाय राष्ट्रहित के चश्मे से देखेंगे तो एक भारतीय होने का भाव मन में पैदा होगा। यदि हम कलेक्टर शब्द को देखें तो यह कलेक्ट से बना है जो लगान कलेक्ट करता था। अंग्रेजी शासन मे इसे कलेक्टर की संज्ञा दी थी। यदि कलेक्टर शब्द का भावार्थ देखें तो इसमें लेने का ही भाव है, देने का भाव नजर नहीं आता है। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो कोटिल्य ने प्रशासनिक प्रमुख के लिए समाहर्ता शब्द को चुना था, जो बिखरे हुए समाज को सहेजने के साथ ही समाज के सूत्रों को जोड़ने में अहम भूमिका अदा करे। प्रधानमंत्री कार्यालय का नामकरण सेवा तीर्थ करना एक तरह से सामंती मानसिकता पर चोट है। इसी तरह राजभवन का नामकरण लोक भवन करना भी सरकार की सोच है कि जब हमारे संविधान की बुनियाद लोक पर टिकी है तो इमारत का नाम राज क्यों रखा जाए। राज शब्द शासन और आमजन में दूरी बढाने में सहायक है। राजभवन ईंट गारे से बनी इमारत नहीं बल्कि लोक कल्याण को समर्पित रहने वाले व्यक्ति का आफिस है। देखा जाए तो सरकार की नीयत साफ है कि अंग्रेजी मानसिकता गुलामी के प्रतीकों को खत्म किया जाए, जिसमें एक अपनेपन की अनुभूति का अहसास हो लेकिन यह भी देखा गया है कि सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए शहरों व सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं, जो विवादों की जननी है। इस तरह के नाम बदलने के लिए एक गंभीर सांस्कृतिक विचार विमर्श की जरूरत है क्योंकि भारत की एकता उसकी विविधता में है। सरकार को भी देखना होगा कि यदि सेवा तीर्थ या लोक भवन में बैठा व्यक्ति उसी औपनिवेशिक वाद से ग्रसित है तो नाम बदलने से कुछ नहीं होगा। इसमें बैठने वाले व्यक्ति को भी नाम के अनुरूप अपनी मानसिकता बदलनी होगी अन्यथा यह राजनीतिक स्टंट साबित होगा।

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