अजमेर के राजनीतिक आकाश में इन दिनों एक खबर लगातार घूम रही है कि क्या आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में अजमेर दक्षिण से भाजपा की विधायक श्रीमती अनिता भदेल को जगह मिल पाएगी। यह सवाल सिर्फ किसी व्यक्ति के पद पाने का नहीं, बल्कि अजमेर की सामाजिक बनावट, भाजपा के आंतरिक समीकरण और राजस्थान की सत्ता-राजनीति में जारी पुराने-नए संघर्षों का भी है।
अनिता भदेल अपने आप में एक सशक्त राजनीतिक प्रतीक हैं। अनुसूचित जाति की महिला नेता, लगातार पाँच बार की विजेता और शहर के शहरी-जातीय समीकरणों में स्थायी पकड़ रखने वाली। यही वजह है कि उनके समर्थक मानते हैं कि पहली बार भले ही उन्हें शामिल न किया गया हो, लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार में उनकी अनदेखी करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। उनका तर्क है कि भाजपा को महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए और शहरी-दलित वोट बैंक को साधने के लिए भदेल जैसे चेहरे की जरूरत पड़ती ही है लेकिन दूसरी ओर एक विरोधी तर्क भी उतनी ही मजबूती से खड़ा है। यह तर्क मुख्य रूप से दो सवालों पर टिका है। पहला यह कि मंत्रिमंडल में पहले से नागौर जिले की मंजू बाघमार जैसी एससी श्रेणी से आई महिला मंत्री मौजूद हैं। भाजपा सामान्यतः एक ही सामाजिक खांचे में ज्यादा प्रतिनिधि जोड़ने से बचती रही है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि बाघमार को हटाए बिना भदेल को कैसे एडजस्ट किया जाएगा। दूसरा तर्क यह कि भदेल भले ही पाँच बार जीती हों, लेकिन उनकी मूल कोली समुदाय पर पकड़ कमजोर बताई जाती है, जबकि भाजपा उन्हें उसी समुदाय के प्रतिनिधित्व के नाम पर टिकट देती रही है। कोली मतदाता आज भी कांग्रेस के प्रति अधिक झुके हुए देखे जाते हैं। भदेल की चुनावी सफलता का बड़ा आधार लंबे समय से सिंधी और माली समुदाय माना जाता है, न कि वह कोली समूह जिसके नाम पर उनका दावा मजबूत दिखाया जाता है। इन सबके बीच एक और महत्वपूर्ण पहलू है वसुंधरा राजे का प्रभाव। राजस्थान की भाजपा राजनीति में राजे का फैक्टर हमेशा निर्णायक माना जाता है और अनिता भदेल उन नेताओं में से रही हैं, जिन्हें राजे ने पहले भी संगठनात्मक संतुलन के लिए आगे बढ़ाया था। आरएसएस समर्थित वासुदेव देवनानी के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भी एक समय अनिता भदेल को मंत्री बनाया गया था। आज भी राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि यदि विस्तार में वसुंधरा राजे की राय को महत्व मिला तो अनिता भदेल का मंत्री बनना लगभग तय माना जा सकता है। कुल मिलाकर, परिस्थिति दो ध्रुवों में बंटी दिखती है। एक ओर सामाजिक प्रतिनिधित्व, पाँच बार की जीत और राजे का समर्थन उनकी दावेदारी को मजबूत बनाते हैं। दूसरी ओर जातिगत संतुलन, बाघमार की मौजूदगी और कोली वोट बैंक पर सवाल उनकी राह को कठिन करते हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि अजमेर में यह अभी तय खबर नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेतों की हलचल है। निर्णय अंततः इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा मंत्रिमंडल विस्तार में किस संतुलन को प्राथमिकता देती है। सामाजिक प्रतिनिधित्व के तर्क को या संगठनात्मक समीकरणों की मौजूदा संरचना को।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*