भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस पर विशेष......

AYUSH ANTIMA
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एक सामान्य शिक्षक के घर में जन्म लेने वाले अटल बिहारी वाजपेयी वह नाम है, जिसने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया। प्रखर राष्ट्रवादी, देशसेवा ही एक मात्र लक्ष्य लेकर देश को समर्पित वह नाम, जिन्होंने सुशासन की नींव रखी। जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का नारा देने वाले अटल जी ने लाल बहादुर शास्त्री के नारे के आगे जय विज्ञान जोड़कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए कि विज्ञान व वैज्ञानिक उपलब्धियों से ही देश की प्रगति संभव है। इस नारे को सार्थक करते हुए अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को दरकिनार करते हुए पोकरण में परमाणु परीक्षण किया था। अटल भारतीय राजनीति में जिस पर भाजपा ही नहीं बल्कि पूरा देश गौरव महसूस करता है। अटलजी राजनीति में मर्यादा के पालक थे। विपक्ष में रहकर भी भारतीय संसद के मूल्यों को सर्वोपरि रखा। राजनीतिक सुचिता व भाषाई मर्यादा का कभी भी हनन नहीं किया। अटलजी जब गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने तो बड़े गर्व के साथ कहा था कि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूं। अटलजी वह शख्सियत थे, जिन्होंने छोटी उम्र में ही अपनी भाषण कला व वाकपटुता से तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु को भी प्रभावित किया था। महिला सशक्तीकरण और सामाजिक समानता के प्रबल समर्थक अटलजी एक दूरदर्शी, आगे बढ़ने वाले भारत, विकसित भारत, एक मजबूत और समृद्ध राष्ट्र में विश्वास रखते थे, जो विश्व समुदाय में अपने उचित व विशिष्ट स्थान के लिए आश्वस्त हो। अपने नाम के अनुरूप अटलजी अटल इरादों के धनी थे। एक प्रख्यात राष्ट्रवादी नेता, एक विद्वान, राजनितिज्ञ, एक निस्वार्थ सामाजिक कार्यकर्ता, सशक्त वक्ता, कवि और साहित्यकार व पत्रकार थे। सही मायने में अटलजी बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। अटलजी जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति करते थे। अटलजी आत्मविश्वास से सराबोर थे, उनके आत्मविश्वास की झलक उनके इस वक्तव्य से दिखती है कि संघर्ष से भागो मत क्योंकि इससे ही जीवन में मिठास आती है। समाजसेवी संस्थाओं के प्रति उनका सम्मान व आदर इस बात से परिलक्षित होता है कि उन्होंने कहा था कि सेवा कार्यों की सरकार से ही उम्मीद नहीं की जा सकती। उसके लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को भी आगे आना पड़ेगा। हिन्दी भाषा के प्रति उनकी निष्ठा व समर्पण कि उनके अनुसार शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए। देश में फैला सांप्रदायिकता के जहर को लेकर अटलजी सदैव चिंतित रहते थे। उनके अनुसार राष्ट्र कुछ सम्प्रदायों तथा जनसमूहो का समुच्चय मात्र नहीं बल्कि एक जीवमान ईकाई है। जिस तरह से आधुनिक परिवेश में राजनीति केवल व्यापार हो गई है व सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दल देश को सम्प्रदायिकता की आग में झौंक रहे हैं, इस तरह की राजनीति के अटलजी घोर विरोधी थे। सत्ता को उन्होंने सुख का साधन नहीं बल्कि देशसेवा माना। राजनीति में अजातशत्रु होने के साथ ही विपक्ष से भी सद्भावना का व्यवहार रखना उनका राजनीतिक कौशल दर्शाता है। संसद में जिस तरह से लोकतंत्र का मखौल उड़ाया जा रहा है, इसको लेकर अटलजी के उस राजनीतिक जीवन से सीख लेनी चाहिए कि विपक्ष में रहकर भी उन्होंने राजनितिक भाषाई मर्यादा को सर्वोपरि रखा। भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह, भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई के जन्मदिन पर आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) परिवार की तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि।

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