भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष का गृह जिले झुनझूनू का दौरा

AYUSH ANTIMA
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भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष के दूसरे कार्यकाल को लेकर झुंझुनूं जिले मे काफी उत्साह देखने को मिला। विदित हो प्रदेश उपाध्यक्ष झुंझुनूं जिले से ही आते हैं। इस दौरे में जगह जगह स्वागत सत्कार हुआ, होना भी चाहिए क्योंकि यह जिले के लिए गौरवशाली क्षण है कि उन पर प्रदेश नेतृत्व ने विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें दूसरी पारी खेलने का मौका दिया। उनका यह दौरा अनेक अनुतरित प्रश्न अपने पीछे छोड़ गया। संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष का झुनझूनू जिले में उपाध्यक्ष बनने के बाद पहली बार गृह जिले का दौरा करें और भाजपा जिलाध्यक्ष इस दौरे को लेकर उदासीनता का परिचय दे, यह जिले में चर्चा का विषय है। आमजन में यह चर्चा रही कि क्या यह उस गुटबाजी का परिणाम है कि जिलाध्यक्ष के धड़े ने इससे दूरी बनाए रखी। विदित हो इस गुटबाजी के चलते जिलाध्यक्ष भी अपनी कार्यकारिणी बनाने में असफल रही है जबकि उनके साथ शेखावाटी के अन्य जिलों मे नवनिर्वाचित जिलाध्यक्षों ने अपनी टीम बना ली है। खैर यह प्रदेश नेतृत्व व जिलाध्यक्ष का विशेषाधिकार है कि टीम की घोषणा कब होती है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जातिगत समीकरण हावी है और हर नेता अपने जातिगत हित साधने में नहीं चूकते। प्रदेश उपाध्यक्ष विप्र समाज से आते हैं और जिले के अलग अलग संगठनों में बंटे विप्र समाज के स्वयंभू नेताओं ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया लेकिन विप्र समाज के उन महानुभावों ने क्या उनसे इस बात की शायद ही मांग की हो कि विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन अभी तक आखिर क्यों नहीं हुआ। संगठन में उपाध्यक्ष पद पर विप्र समाज का व्यक्तित्व विराजमान हैं और सरकार के मुखिया के रूप मे भी भजन लाल शर्मा प्रदेश की बागडोर संभाले हुए हैं, इसके बावजूद विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन न होना क्या विप्र समाज की अनदेखी नहीं है, जबकि अन्य समाज के कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन सरकार द्वारा कर दिया गया है। प्रदेश उपाध्यक्ष व मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की नजदीकियां सर्व विदित है, उसके बावजूद भी विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन न होना, इस बात का भी प्रतीक है कि विप्र समाज को भाजपा ने हासिए पर धकेल दिया है जबकि प्रदेश नेतृत्व विप्र समाज द्वारा ही किया जा रहा है। 
स्वागत सत्कार को लेकर इस तथ्य पर भी चर्चा जरुरी हो जाती है कि आखिर गृह जिले के लिए प्रदेश उपाध्यक्ष की क्या उपलब्धियां रही है। किसी भी समाज के महानुभाव को इस सोच के साथ काम नहीं करना चाहिए कि समाज ने हमें क्या दिया बल्कि उसकी यह अवधारणा होनी चाहिए कि हम समाज को क्या दे रहे हैं।

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