एक ही एकै भया अनन्द, एक ही एकै भागे द्वन्द॥ एक ही एकै एक समान, एक ही एकै पद निर्बाण॥ एक ही एकै त्रिभुवन सार, एक ही एकै अगम अपार॥ एक ही एकै निर्भय होइ, एक ही एक काल न कोइ।। एक ही एकै घट परकाश एक ही एक निरंजन वास॥ एक ही एक आप हि आप, एक ही एक माइ न बाप॥ एक ही एकै सहज स्वरूप एक ही एकै भये अनूप॥ एक ही एकै अनत न जाइ, एक ही एकै रह्या समाइ॥ एक ही एक भये लै लीन, एक ही एक दादू दीन॥ जीव ब्रह्म ही एकता का ज्ञान होने से मैं आत्मस्वरूप ब्रह्म में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो गया। निर्द्वन्द्र होने से सब समान ही भासित हो रहे हैं। अब मैं निर्वाण पद को प्राप्त हो गया हूँ। त्रिभुवन का सारभूत जो अमर, अभय, अपार, ब्रह्म पद का लक्ष्य है उसका मुझे परिचय हो गया। अब मैं निर्भय कालातीत हूं। अन्त:करण ज्ञानसंपन्न है और निरंजन निराकार ब्रह्म में मेरी स्थिति हो गई, एकत्वदशा में मातृपितृता आदि का भेद भाव भी समाप्त हो जाता है। अनुपम ब्रह्म ही केवल भासता है। अब अपने स्वरूप में लीन होने के कारण मेरा आना-जाना भी कहीं नहीं होता। इस तरह जिसका मन समभाव के कारण ब्रह्म में लीन हो गया वह ब्रह्मरूप हो जाता है। जैसे मुण्डक में लिखा है कि- जिस प्रकार बहती हुई नदियां नाम रूप को त्याग कर समुद्र में विलीन हो जाती है। वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नामरूप से मुक्त होकर उतम से उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
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