गौचर भूमि पर अतिक्रमण

AYUSH ANTIMA
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गौचर भूमि चारागाह पर कब्जा एक गंभीर व दंडनीय अपराध है क्योंकि यह सार्वजनिक संपत्ति है और इसका उपयोग गौवंश‌ व अन्य पशुओं के चरने के लिए होता है। यह अतिक्रमण स्थानीय निकायों व ग्राम पंचायतों के संरक्षण द्वारा ही संभव हो पाता है। ग्राम पंचायतों मे सरपंच अपने रसूखदारों व वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए पट्टे जारी करता है जबकि सरपंच को ऐसे पट्टे जारी करने का कोई अधिकार नहीं होता है। देखा जाए तो यह भूमि पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसलिए पर्यावरण को बचाने के लिए इस भूमि का संरक्षण अति आवश्यक हो जाता है। यदि बेसहारा गौवंश जो सड़कों पर लठ्ठ व कूड़ा करकट खाता घूम रहा है, उसके लिए यह भूमि जीवनदायिनी के रूप में होती है। जबसे यह भूमि लुप्त हुई है, बेसहारा गौवंश दयनीय अवस्था में है। इसी क्रम में मंदिर माफी की जमीन वह भूमि है, जो मंदिरों के रख रखाव व पूजा-पाठ करने वाले पुजारियों के जीवनयापन के लिए दान की गई थी। यह भूमि अक्सर भू राजस्व (लगान) से मुक्त होती है। यदि सूत्रों की मानें तो राजस्व के रिकार्ड में इस जमीन का स्वामित्व देवता के नाम होता है लेकिन देखा गया है कि ऐसी जमीन माफिया की जद में आकर उन पर कब्जा हो जाता है। मंदिर के पुजारी के पास इतनी आर्थिक या राजनीतिक शक्ति नहीं होती कि इस भूमि पर से अवैध कब्जे को हटा सके क्योंकि अतिक्रमण या अवैध कब्जे करने वाले लोगों के संबंध राजनीति में बैठे सरमायदारो से होते हैं क्योंकि बिना राजनीतिक संरक्षण ऐसा करना नामुमकिन है। ऐसे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त है लेकिन गौचर भूमि व मंदिर माफी की भूमि को मुक्त कराने का काम राज्य सरकार के विशेषाधिकार में आता है। उक्त दोनों प्रकरणों को देखें तो जिले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अतिक्रमण हटाया जा रहा है, जिसको लेकर आमजन में आक्रोश व दहशत का माहोल है। देखा जाए तो ऐसे मामलो में तहसीलदार, गिरदावर, ग्राम सेवक, बीडीओ व सरपंच की भूमिका संदिग्ध होती है क्योंकि इनके संरक्षण के बिना ऐसी भूमि के फट्टे जारी करना संभव नहीं होता है। आमजन भी अपने लालच को लेकर ऐसे मामलों में फंस जाता है व अपना आसियाना बेबस नजरों से टूटता हुआ देखने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता। जिले में गौचर भूमि इन्हीं कारणों से सिकुड़ गई है। आमजन को सोचना होगा कि गौचर भूमि सहित सरकारी भूमि पर कब्जा करने से वह मालिक नहीं बन जाता क्योंकि यह जनता की संपति होती है। ऐसे मामलों को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की बात करें तो निचली अदालतों से लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण के खिलाफ महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं, जो कानूनी नज़ीर बन गये। ऐसे मामलों में जनसहभागिता की भूमिका साइलेंट मोड में आना ऐसे कामो को बढावा देना है क्योंकि ऐसे मामलो में ग्रामीणों को लामबंद होना होगा। यदि सरकारी स्तर की बात करें तो पट्टे जारी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए कि उन्होंने सार्वजनिक संपति के पट्टे जारी कैसे व किसके दबाव में कर दिए।

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