आज के परिवेश में भारतीय राजनीति जाति पर आधारित है। जातिगत समीकरण के आधार पर ही टिकट दिये जाते हैं और मंत्रिमंडल में भी जातिगत समीकरण को ध्यान में रखा जाता है लेकिन यूपी में विप्र समाज के करीब पचास विधायकों की बैठक ने यूपी की सियासत में गर्माहट ला दी है। विदित हो पिछले दिनो जब क्षत्रीय व कुर्मी समाज के जनप्रतिनिधियो की बैठक हो चुकी है तो विप्र समाज के जनप्रतिनिधियों की बैठक को लेकर इतना हंगामा आखिर क्यों हैं, यह समझ से परे है। बैठक को लेकर बात करें तो इस बैठक में समाज की एकजुटता बढ़ाने और इसका स्पष्ट संकेत देने पर चर्चा हुई। पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक दलों, उनके नेताओं द्वारा विप्र समाज को निशाना बनाने का मुद्दा भी उठाया गया। सूत्रों की मानें तो विप्र समाज की भाजपा की सफलता के पीछे समाज की बड़ी भूमिका होने के बावजूद संगठन से लेकर सरकार तक प्रतिनिधित्व व सम्मान न मिलने पर भी चर्चा हुई। इस बैठक के संयोजक विधायक पंचानंद पाठक ने बताया कि बैठक महज एक औपचारिकता मात्र थी, जो एक सामान्य घर परिवार का भोज था। इसका राजनीतिक महत्व न निकाला जाए। इस बैठक को लेकर यूपी भाजपा प्रदेश नेतृत्व को विप्र समाज के विधायकों का एक साथ बैठक करना रास नहीं आया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस बैठक को लेकर सख्त लहजे में कहा कि ऐसी गतिविधियां भाजपा के संविधान और आदर्शों के खिलाफ है। भाजपा सिद्धान्त राजनीति करती है और जाति या वर्ग की राजनीति में विश्वास नहीं करती है। भाजपा विधायकों की यह बैठक भाजपा के सिध्दांतों से मेल नहीं खाती, यदि भविष्य में ऐसा हुआ तो अनुशासनात्मक कार्रवाई की जायेगी। अब यदि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की बात का पोस्टमार्टम करें तो भाजपा जातिगत समीकरण के मध्यनजर टिकट बांटती है और पंकज चौधरी को भी आगामी विधानसभा के चुनावों को देखते हुए जातिगत समीकरण साधते हुए प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। यदि भाजपा जातिवाद की राजनीति नहीं करती तो गृह जिले झुनझूनू में एक जाति विशेष के उम्मीदवार को ही तवज्जो क्यों दी जाती है। यदि सिध्दांतों की बात करें तो भाजपा में जब तक अटल-आडवाणी युग था, उसी समय तक सिद्धान्तो की राजनीति होती थी। सत्ता की राजनीति यदि भाजपा युग में करती तो अटल जी की सरकार को एक वोट से सत्ता से बाहर नहीं होना पड़ता। अब तो भाजपा आयातित नेताओं पर विश्वास करती है, जो भाजपा के सिध्दांतों व नितियों के कट्टर समर्थक है और जनसंघ के समय से भाजपा के साथ है, उनको दरकिनार किया जाता है। जब राजनीति सत्ता पर आधारित हो जाती है तो सिध्दांतों की राजनीति गौण हो जाती है, यही आधुनिक भाजपा में हो रहा है।
यदि अपने स्वाभिमान व सम्मान के लिए विप्र समाज के जनप्रतिनिधियों की बैठक होती है तो इस पर इतना आखिर बवाल क्यों हैं।