अरावली पर्वत मालाएं इतिहास बनने की ओर अग्रसर

AYUSH ANTIMA
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अरावली पर्वतमाला का इतिहास करीब 2.5 अरब साल पुराना है। इसकी कुल लंबाई लगभग 692 किमी है और इसका करीब 550 किमी हिस्सा राजस्थान से होकर गुजरता है। इसी से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह राजस्थान के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। राजस्थान की लाइफ लाइन अरावली पर्वत श्रृंखला भूजल को रिचार्ज करने में अहम भूमिका अदा करती है, जंगलो का संरक्षण और वन्य जीवों को आश्रय देने के साथ ही आमजन को सांस लेने लायक शुद्ध हवा भी उपलब्ध करवातीं है। अरावली केवल पत्थरों और पहाड़ियों की श्रृंखला ही नहीं बल्कि उत्तर भारत खासकर राजस्थान की जीवन रेखा है। यह पर्वतमाला थार मरुस्थल की रेत, लू और धूल भरी आंधियों को राजस्थान के उपजाऊ भाग तक पहुंचने से अवरोधक का काम करती है लेकिन वर्तमान में अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं सियासत की भेंट चढ़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान सरकार ने माननीय कोर्ट में जबाब दाखिल किया कि अरावली की पहचान और संरक्षण की सीमा तय करने के लिए ऊंचाई को आधार बनाया जाना चाहिए। सरकार के अनुसार स्थानीय भू स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना जायेगा। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले टीले, छोटी पहाड़ियां और गैपिंग एरिया को अरावली की परिभाषा में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इसको लेकर राजस्थान की सियासत गरमा गई। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली को लेकर प्रस्तावित परिभाषा पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अरावली को केवल ऊंचाई या तकनीकी मापदंडों से नहीं बल्कि पर्यावरणीय महत्व के आधार पर देखा जाना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि यदि अरावली कमजोर हुई तो प्रदूषण की स्थिति भयावह होने के साथ ही जो राजस्थान पानी के संकट से पहले ही ग्रस्त हैं तो आने वाली पीढ़ी को पीने के पानी का भयंकर संकट देखने को मिल सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार इसके स्वरूप से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ भविष्य में पर्यावरण संकट को जन्म दे सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पर्वत माला को ही पर्वत माना गया तो अरावली का लगभग अस्सी प्रतिशत क्षेत्र खनन व व्यवसायिक गतिविधियो के लिए खुल जायेगा। यदि ऐसा हुआ तो वह क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो जायेगा। देखा जाए तो अरावली की अधिकांश पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की है। यदि इनका खनन हुआ तो पहाड़ पठार में बदल जायेंगे। विदित हो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में अरावली की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। 1990 के दशक में एमसी मेहता बनाम यूनियन आफ इंडिया जैसे मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान और हरियाणा में अनियंत्रित खनन पर रोक लगाई और स्वीकार किया कि इससे होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अपूरणीय है। ऐसे में उसी अरावली की नये सिरे से व्याख्या करना उसको कमजोर करना है। यह भी देखने योग्य बात है कि राजस्थान की डबल इंजन सरकार ने अपने बजट में 250 करोड़ की राशि देकर हरित अरावली विकास परियोजना शुरु की थी लेकिन खनन माफिया व कारपोरेट के दबाव में अब इस पर्वतमाला को खनन हेतु सौंपा जा रहा है। सरकार के इस फैसले से राजस्थान की लाइफ लाइन अरावली पर्वत श्रृंखला इतिहास बनने की ओर अग्रसर है।

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