कांग्रेस आज केवल चुनाव नहीं हार रही, वह लड़ने की क्षमता भी खो चुकी है। पार्टी के भीतर गुटबाजी, पुराने नेताओं का सत्ता-मोह और नेतृत्व का केंद्रीकरण उसे निरंतर कमजोर कर रहा है। कांग्रेस से युवा दूर हो रहे हैं और नेता सत्ता के बिना टिक नहीं पा रहे। ऐसे में पार्टी के पुनर्जीवन के लिए सबसे पहले पुरानी कांग्रेस का ढांचा टूटना जरूरी है। यदि पार्टी को लगता है कि गांधी परिवार ही ऊर्जा दे सकता है, तो प्रियंका गांधी को नेतृत्व देना एक साहसिक प्रयोग हो सकता है। उनकी आक्रामक शैली संगठन में नया उत्साह ला सकती है पर यह तभी संभव है, जब पुराने दिग्गज सत्ता छोड़कर संगठन को मजबूत करने में वही शक्ति लगाएँ, जो सत्ता पाने में लगाते रहे हैं, साथ ही, कांग्रेस को परिवार-निर्भर मॉडल से आगे बढ़ना होगा। नेतृत्व का विकेंद्रीकरण चाहे प्रियंका हों या परिवार से बाहर के मजबूत नेता, पार्टी में नई जान फूँकेगा और वंशवाद के आरोपों को कमजोर करेगा। एक कमजोर कांग्रेस केवल उसकी समस्या नहीं, यह भारतीय लोकतंत्र के संतुलन को भी नुकसान पहुँचाता है। मजबूत विपक्ष के बिना सत्ता की जवाबदेही घटती है। अंततः कांग्रेस का पुनर्जन्म तभी संभव है जब पुरानी कांग्रेस मरे, यानी अहंकार, सत्ता-लालसा और केंद्रीकृत नेतृत्व का अंत हो। परिवर्तन के साथ ही पार्टी फिर से संघर्ष, संगठन और लोकतंत्र में एक मजबूत स्तंभ बन सकती है।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*