हर साल 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देना, विकलांगता के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और समाज में उनके योगदान को स्वीकार करना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1992 में 3 दिसंबर को यह दिवस मनाने की घोषणा की थी। इसका मुख्य उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के प्रति करुणा और समझ को बढ़ावा देना, उनके अधिकारों और कल्याण के लिए समर्थन जुटाना और उन्हें समाज में बराबरी के अवसर सुनिश्चित करना रहा है। यह दिन इस वर्ग के सामने आने वाली चुनौतियों और बाधाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारत में, यह दिन को सुगम्य भारत अभियान जैसे पहलों के माध्यम से भी मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और सूचना एवं संचार को सुलभ बनाना है। अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस एक संयुक्त राष्ट्र दिवस है। यह दिवस समाज और विकास के हर स्तर पर इन व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देने और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के सभी पहलुओं में इन व्यक्तियों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर हर साल यह दिवस मनाता है, जिसमें इन व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया जाता है, ताकि वे समाज में दूसरों के साथ पूरी तरह, समान रूप से और प्रभावी रूप से भाग ले सकें। जिनेवा स्थित अपने मुख्यालय में, विश्व स्वास्थ्य संगठन जनता को शिक्षित करने, जागरूकता बढ़ाने, राजनीतिक इच्छा शक्ति और संसाधनों की वकालत करने के लिए एक वार्षिक कार्यक्रम आयोजित करता है। वर्ष 2022 में विकलांग व्यक्तियों के लिए स्वास्थ्य समानता पर वैश्विक रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें उन दृष्टिकोणों और कार्यों को प्रस्तुत किया गया, जो देश दिव्यांग व्यक्तियों द्वारा अनुभव की जाने वाली स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने के लिए अपना सकते हैं। भारत सरकार द्वारा दिव्यांग सशक्तिकरण हेतु पहल के तहत 12 मई, 2012 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से अलग दिव्यांगता मामलों का विभाग स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य नीतिगत मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करने तथा उनके कल्याण और सशक्तिकरण के उद्देश्य से गतिविधियों को सार्थक बल देना है। 8 दिसंबर, 2014 को इस विभाग का नाम बदलकर ‘दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग कर दिया गया। देश में 3 दिसंबर, 2015 से सुगम्य भारत अभियान प्रारम्भ किया गया। इसके तहत सार्वजनिक स्थानों में निर्मित पर्यावरण सुगम्यता में सुधार,स्वतंत्र गतिशीलता के लिए परिवहन सुगम्यता में वृद्धि,एक सुगम्य सूचना और संचार पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण, दुभाषिया प्रशिक्षण और मीडिया समर्थन के माध्यम से सांकेतिक भाषा तक पहुंच का विस्तार करना शामिल है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 2.68 करोड़ (26.8 मिलियन) दिव्यांग व्यक्ति हैं, जो देश की कुल जनसंख्या का 2.21% है। यह अनुमानित संख्या पुरुषों (1.5 करोड़) और महिलाओं (1.18 करोड़) के बीच विभाजित है और अधिकांश दिव्यांगजन ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। कुछ अन्य अनुमानों, जैसे कि विश्व बैंक की रिपोर्ट, में यह संख्या 4 करोड़ से 8 करोड़ के बीच हो सकती है। लगभग 69% दिव्यांगजन ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। इन्हें राहत देने के लिए भारत में दीनदयाल दिव्यांगजन पुनर्वास योजना प्रारम्भ की गई। दिव्यांगजन के लिए समान अवसर, समानता, सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए एक सक्षम वातावरण बनाना और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए स्वैच्छिक कार्रवाई को प्रोत्साहित करना इसका उद्देश्य है। पीएम-दक्ष (प्रधानमंत्री दक्षता और कुशलता संपन्न हितग्राही) योजना कौशल प्रशिक्षण संगठनों और भारत भर के नियोक्ताओं के लिए एक वन-स्टॉप पोर्टल है। इस पोर्टल के अंतर्गत दो मॉड्यूल हैं: दिव्यांगजन कौशल विकास, जिसमें देश भर में पोर्टल के माध्यम से कौशल प्रशिक्षण आयोजित किया जाता है। दिव्यांगजन रोजगार सेतु प्लेटफॉर्म का उद्देश्य रोजगार देने वाले नियोक्ताओं के बीच सेतु का काम करना है और रोजगार/आय के अवसरों के बारे में जियो-टैग आधारित जानकारी प्रदान करना है। ’अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस’ वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों के लिए एक आह्वान है कि वे समाज में सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में दिव्यांग व्यक्तियों की क्षमता को पहचानें। भारत सरकार द्वारा की गई विभिन्न पहलें एक समावेशी और न्यायसंगत भविष्य की ओर प्रगति का उदाहरण है। मनरेगा जैसी योजनाएं दिव्यांगजनों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार प्रदान करती हैं।दिव्यांगजनों को व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए कई कौशल प्रशिक्षण कार्यशालाएं और व्यावसायिक पुनर्वास केंद्र स्थापित किए गए हैं। दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना जैसी योजनाएं दिव्यांगजनों के पुनर्वास के लिए गैर-सरकारी संगठनों को अनुदान प्रदान करती हैं। भारत में दिव्यांगों के लिए जो एक्ट, 2016 है, उसमें दिव्यांगता की 7 की बजाय अब 21 श्रेणियाँ मान्यता प्राप्त हैं। इसके तहत सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा में दिव्यांगों के लिए आरक्षण आदि प्रावधान हैं। वर्ष 2015 में शुरू किए गए सुगम्य भारत अभियान में सार्वजनिक भवन, परिवहन, सूचना-प्रौद्योगिकी सुविधाओं व अन्य सार्वजनिक स्थानों को दिव्यांगजनों के लिए सुगम बनाने की दिशा में काम शुरू हुआ। दीनदयाल पुनर्वास और सहायता योजना में ऐसे संगठन (एनजीओ या स्वयंसेवी संस्थान) जो दिव्यांगजनों के पुनर्वास व सामाजिक समावेशन पर काम करते हैं, उन्हें केंद्र सरकार ने सहयोग देना शुरू किया। शिक्षा और कौशल विकास के तहत दिव्यांग बच्चों को मुख्यधारा की स्कूलों में शामिल करने और उच्च शिक्षा में पहुँच सुनिश्चित करने की पहल की गई। कई स्थानों पर सहायक उपकरण ब्रेल, साइन-लैंग्वेज आदि सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता व रोजगार या स्वरोजगार की दिशा में सरकार और सामाजिक संस्थाएँ दिव्यांगों के स्वरोजगार, हुनर-प्रदर्शनी, हस्तशिल्प, कामकाजी प्लेटफार्म आदि के माध्यम से उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रही हैं। दिव्य कला मेला के जरिए दिव्यांगों के उत्पादों को बाज़ार उपलब्ध करवाया जा रहा है। कई राज्यों में दिव्यांगता के क्षेत्र में काम करने वालों को सम्मान दिया जाता है। वैसे अभी कई चुनौतियाँ हैं और हमें आगे बढ़ने की जरूरत है। कानून व नीतियाँ हैं, लेकिन हर सार्वजनिक भवन, विद्यालय, परिवहन, सार्वजनिक स्थान आदि पूरी तरह सुगम नहीं हुए हैं, समावेशन और पहुँच अभी भी असंतोषजनक स्तर पर है। दिव्यांगों के लिए सहायक उपकरण, सुविधाएँ एवं विशेषज्ञ शिक्षा/प्रशिक्षण जितनी ज़रुरी है, वो सभी तक पहुँचना अभी एक चुनौती बनी हुई है। भेदभाव, अनदेखी, जागरूकता की कमी अभी भी बनी हुई है, जो अक्सर दिव्यांगों के आत्म-विश्वास व भागीदारी में अवरोध बन जाती है। रोज़गार के अवसर और वास्तविक स्वरोजगार या स्थायी रोजगार के क्षेत्रों में पाबंदियाँ, पूर्वाग्रह और संरचनात्मक मुश्किलें महसूस की जाती हैं।
अगर कुछ और सार्थक कदम उठाए जाएँ तो दिव्यांगजन को काफी राहत पहुंचाई जा सकती है। सुगम्य अवसंरचना में हर सार्वजनिक और निजी स्थान, परिवहन माध्यम, स्कूल-कॉलेज, ऑफिस को दिव्यांगजन के अनुकूल बनाना चाहिए। शिक्षा से पूर्व स्कूल और कॉलेजों में सहायक उपकरण, साइन-लैंग्वेज, ब्रेल, शिक्षक-प्रशिक्षण आदि सुनिश्चित किया जाए। रोजगार व स्वरोजगार को बढ़ावा देते समय दिव्यांगों के लिए विशेष कौशल प्रशिक्षण, कामकाजी माहौल में समायोजन,आर्थिक मदद, माइक्रो-फाइनेंस और लोन आदि सुविधाएँ दी जाएँ। सामाजिक जागरूकता बढ़ाएँ। यह न सिर्फ 3 दिसंबर ही नहीं बल्कि निरन्तर समूचे समाज में दिव्यांगों को बराबरी व सम्मान देने की भावना को बढ़ावा देना होगा। स्वास्थ्य, पुनर्वास और देखभाल सुविधाएँ और बढ़ाई जाएँ। सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, पुनर्वास केन्द्र, सहायक उपकरणों तक सुगम पहुँच हो।