SIR के दबाव में टूटते BLO*

AYUSH ANTIMA
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देश भर में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बीच बूथ लेवल अधिकारियों—यानि BLOs—की हालत चिंताजनक हो चली है। यह वही कर्मचारी हैं, जिनके कंधों पर लोकतंत्र की आधारशिला टिकती है, लेकिन आज यही लोग अपने ही सिस्टम की मार झेलते-झेलते टूटने लगे हैं। केरल से लेकर राजस्थान और उत्तर भारत के कई राज्यों तक अवसाद, असहनीय तनाव और आत्महत्या जैसी त्रासद खबरें लगातार सामने आ रही हैं। यह केवल व्यक्तिगत घटनाएँ नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढाँचे की गहरी बीमारी का संकेत हैं।
SIR की प्रक्रिया कागज़ पर भले सरल दिखती हो—घर-घर जाकर मतदाता सत्यापन, दस्तावेज़ एकत्र करना, फॉर्म भरना, संशोधन और अपडेशन—लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। एक BLO के हिस्से में आता है सैकड़ों घरों का बोझ, सीमित समय सीमा, मोबाइल ऐप में अनिवार्य अपलोड, बार-बार सर्वर फेल होने की दिक्कतें और ऊपर से अधिकारियों की रोज़ाना की टारगेट-पूर्ति की हिदायतें। कई जगह तो उनकी मूल नौकरी—जैसे स्कूल के शिक्षक भी प्रभावित हो रही है और उन्हें दोहरी जिम्मेदारियों के बीच पिसना पड़ रहा है। बीते दिनों केरल के कन्नूर में एक BLO की संदिग्ध मौत ने पूरे तंत्र को झकझोर दिया। परिवार ने स्पष्ट कहा कि काम का बोझ और राजनीतिक दबाव ने उसे तोड़ दिया। राजस्थान और उत्तर भारत से भी इसी तरह की आत्महत्या और अवसाद की घटनाएँ सामने आईं। कुछ जगहों पर BLOs ने खुलकर कहा कि हम लक्ष्य नहीं मशीनें हैं और SIR हमें मानसिक रूप से बीमार कर रहा है। सबसे दर्दनाक यह है कि BLO न तो किसी सुरक्षा का हकदार है, न मानसिक-स्वास्थ्य समर्थन का और न ही अपनी समस्याओं को सुनाने का कोई दृष्य मंच। उलटा, कई जगहों पर धमकी, निलंबन और नोटिस के डर ने उनका जीवन और मुश्किल कर दिया है। सिस्टम उन्हें फ्रंटलाइन वर्कर कहता है, पर व्यवहार में उन्हें ऐसे संभाला जाता है जैसे वे मशीन हों—जिन्हें मनचाहा उपयोग कर लिया जाए। इस पूरे संकट की जड़ें तीन जगह हैं:
* पहला, अवास्तविक लक्ष्य और अत्यधिक कार्यभार।
* दूसरा, उच्च अधिकारियों और स्थानीय राजनीतिक समूहों का दबाव।
* तीसरा, BLO के लिए किसी तरह के भावनात्मक, संरचनागत या कानूनी संरक्षण का लगभग अभाव।
सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र बनाने वाले लोग ही लोकतंत्र की मार खाकर मरेंगे। 
मतदाता सूची का संशोधन बेहद ज़रूरी है, लेकिन इसे करने वालों की कीमत उनकी जान नहीं हो सकती। यह काम किसी सेना अभियान की तरह दंडात्मक व्यवस्था से नहीं, सहयोग, प्रशिक्षण और मानवीय दृष्टिकोण से होना चाहिए। जरूरत है कि केंद्र और राज्य के चुनाव प्रशासन तुरंत कदम उठाएँ—लक्ष्य यथार्थ परक बनाएँ, कार्यकाल बढ़ाएँ, सुरक्षा-मानदंड तय करें, मानसिक-स्वास्थ्य सहायता दें और BLO को फुट-सोल्जर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक स्तंभ समझकर व्यवहार करें। यह त्रासदी केवल व्यक्तिगत परिवारों का शोक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की चुप चीख है। अगर आधारशिला टूटेगी, तो इमारत खुद गिर जाएगी।

*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*

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