अजमेर में इन दिनों एक बड़ा ऐतिहासिक प्रयोग चल रहा है। नगर निगम ने तय किया है कि शहर की सफाई अब केवल भगवान भरोसे नहीं छोड़ी जाएगी, उसके लिए व्यापारियों की जेब भी जिम्मेदार होगी। आखिर सफाई भी तो एक तरह का निजी लग्ज़री आइटम है, है ना। जैसे मोबाइल रिचार्ज, बिजली का बिल और शादी में डीजे। निगम आयुक्त महोदय का तर्क बड़ा ही वैज्ञानिक है। भाई साहब, दिन के सिर्फ आठ रुपये देने हैं, इतनी भी मदद नहीं करेंगे तो विकास कैसे होगा। यह सुनकर कई व्यापारी सोच में पड़ गए कि क्या वे आज तक अनजाने में ही शहर के विकास में बाधा बन रहे थे। कहीं उनकी सुबह-सुबह दुकान झाड़ने की आदत ही शहर को पिछड़ा हुआ तो नहीं बनाए हुए थी। उधर व्यापारी संघ का दर्द भी कम नहीं है। वे कहते हैं कि जीएसटी, हाउस टैक्स, रोड टैक्स, दुकान का लाइसेंस, इतना टैक्स तो हम दे ही रहे हैं, अब सफाई का अलग से टैक्स।
*क्या अगली बार हवा टैक्स और धूप टैक्स भी लगेगा*
व्यापारी इतना टैक्स दे-देकर हल्का हो चुका है कि अब उसे निगम का यह नया शुल्क वजन जैसा महसूस होने लगा है।
आयुक्त कहते हैं कि शहर की सफाई सभी की जिम्मेदारी है। व्यापारी कहते हैं कि बिलकुल! जिम्मेदारी आपकी और रकम हमारी। कचरा उठाने वाला वाहन व्यापारी इलाके में आते ही ऐसा एहसास दिलाता है, जैसे वह कह रहा हो कि देखो भाई, हम आए हैं…फीस दो, तभी कचरा जाएगा। व्यापारी मन ही मन सोचता है कि अरे मेरे भाई, तुम तो पहले ही आते थे… क्या अब वीआईपी की तरह लाल कालीन भी बिछाऊँ। कुछ व्यापारी यह भी पूछ रहे हैं कि जब सब टैक्स दे रहे हैं और सफाई पहले से नगर निगम की बुनियादी जिम्मेदारी है तो यह नया शुल्क किस अध्याय में आता है। शायद यह नगर निगम की नई इनोवेटिव रेवेन्यू स्कीम है। कमाई के नए स्त्रोत खोजें, चाहे कचरे में ही क्यों न हों। पूरे विवाद का सार यही है कि नगर निगम कह रहा है कि थोड़ा और दे दो, शहर चमका देंगे। व्यापारी कह रहा है कि पहले शहर चमकाओ, फिर हम दे देंगे। अंत में यह विवाद अजमेर की सड़क पर खड़ा है और दोनों पक्ष इसे ऐसे देख रहे हैं, जैसे यह कोई समझदार तीसरा व्यक्ति हो जो किसी तरह इन्हें समझा दे पर सड़क भी सोचती होगी कि मेरी सफाई हो जाए, किससे क्या लेना, बस कोई जिम्मेदारी ले ले।
सच यह है कि अजमेर में कचरा बहुत है, पर इस समय सबसे ज्यादा कचरा आरोप–प्रत्यारोप का है। जब तक दोनों पक्ष यह तय नहीं कर लेते कि शहर किसकी जिम्मेदारी है, तब तक शहर भी मुस्कुरा कर यही कहेगा कि भाई साहब, मुझे साफ़ करना है… राजनीति नहीं।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*