लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ। कबहूँ पेट न आफरै,भावै तेता खाइ।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि पाचन की क्षमता के अनुसार किया हुआ भोजन कभी अजीर्ण पैदा नहीं करता; वैसे ही जो साधक हरी भक्तिजन्य साक्षात्कार रूप फल को किसी से नहीं कहता, किंतु सुरक्षित गुप्त रखता है, उनके मन में आध्मान तुल्य अहंकार पैदा नहीं होता कि मैं ज्ञानी हूं। ईश्वर सर्वज्ञ है, वह सबको जानता है, अतः उसके आगे कुछ भी कहना व्यर्थ है। इसी प्रकार अन्य के आगे कहना भी व्यर्थ है क्योंकि उसको कहने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। प्रत्युत ऐसे व्यर्थ कथन से ज्ञान नष्ट हो जाएगा। योगवसिष्ठ में अहंकार से जो कुछ मैंने खाया, हवन या और कोई कर्म किया, यह सब व्यर्थ ही है क्योंकि वस्तु तो अहंकार रहित है, अतः किसी भी वस्तु का अहंकार न करना ही उचित है।
ब्रह्म साक्षात्कार का वाणी से वर्णन नहीं किया जा सकता और जो प्रभु भक्ति की है, उसका भी अपने मुख से "मैंने भक्ति की है।" इस तरह वर्णन नही करना चाहिये।