कांग्रेस नेतृत्व की सबसे बड़ी समस्या अब उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसका अपना निर्णयहीन हाईकमान बन चुका है। जिस पार्टी ने आज़ादी के बाद दशकों तक देश की राजनीति को दिशा दी, उसी पार्टी में आज नेतृत्व का संकट इतना गहरा है कि शीर्ष से समय पर निर्णय न आने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे संगठन को गर्त में धकेल चुकी है। कांग्रेस के मौजूदा संकट की जड़ें वहीं से शुरू होती हैं, जहां हाईकमान कब, कैसे और क्या निर्णय लेना है, इस पर स्पष्ट और त्वरित सहमति नहीं बना पाता। नतीजा यह होता है कि राज्यों में संगठन बिखरता रहता है, गुटबाज़ी मजबूत होती जाती है और जमीनी कार्यकर्ता लगातार हतोत्साहित होते जाते हैं। किसी राज्य में अध्यक्ष चुनने का फैसला महीनों तक लटका रहता है, कहीं नेता प्रतिपक्ष के चयन पर कशमकश चलती रहती है, तो कहीं टिकट वितरण का मामला आखिरी घंटों तक अनिर्णय की भेंट चढ़ जाता है। जब शीर्ष नेतृत्व समय पर और स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाता, तो स्वाभाविक है कि नेता और कार्यकर्ता संदेश का इंतज़ार करते हुए निष्क्रिय हो जाते हैं। इस निर्णयहीनता की कीमत चुनावों में बार-बार हार बनकर सामने आई है। सिर्फ विरोधियों की ताकत ही कांग्रेस को पीछे नहीं धकेलती, बल्कि हाईकमान की यह धीमी गति भी उसे लगातार कमजोर करती है। जिस पार्टी का संगठन कभी अनुशासन और केंद्रीकृत नेतृत्व का पर्याय रहा, वही अब कौन फैसला करेगा और कब करेगा जैसी दुविधाओं में उलझकर अपना राजनीतिक वजूद खोता जा रहा है। इसके राजनीतिक परिणाम भी बेहद गंभीर हैं। प्रदेश स्तर के नेता अपना महत्व और अधिकार खोकर "सिर्फ हाईकमान की प्रतीक्षा में खड़े दिखाई देते हैं। यह संस्कृति नेतृत्व तैयार नहीं होने देती, बल्कि आज्ञापालन और चापलूसी को बढ़ावा देती है। यही कारण है कि कांग्रेस में आज नए नेता उभर नहीं रहे, बल्कि पुराने चेहरे ही बार-बार सीमित प्रभाव के साथ सामने आते हैं।
यदि कांग्रेस को खुद को पुनर्जीवित करना है, तो हाईकमान को सबसे पहले अपनी निर्णय क्षमता को मजबूत करना होगा। तेज, स्पष्ट और सामयिक फैसले ही संगठन में भरोसा पैदा करते हैं और कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देते हैं। जब तक शीर्ष नेतृत्व अनिर्णय के बोझ से मुक्त नहीं होता, तब तक कांग्रेस का पुनरुत्थान सिर्फ कल्पना बना रहेगा। कुल मिलाकर, हाईकमान की निर्णयहीनता कांग्रेस के लिए सिर्फ एक कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता बन चुकी है, जिसका इलाज इसी नेतृत्व को करना होगा, वरना गर्त और गहरा होता जाएगा।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*