एक कामचोर गधे से उसके मालिक़ ने कहा कि यदि तूने ढंग से मेरे कहे मुताबिक़ काम नहीं किया तो तुझे राजस्थान के शिक्षा विभाग में मास्टर बनवा दूंगा।शिक्षा मंत्री से अपनी अच्छी जान पहचान है। मुख्यमंत्री भी अपने गांव के ही हैं। गधा पैरों में लोटपोट हो गया। शायद उसे अंदाज़ा हो गया था कि उसका मालिक बड़ा कसाई है। कहीं उसे मास्टर बनवा दिया तो विभाग उसे बीएलओ बना देगा, बेचारा मास्टर बनने के डर से सुधर गया। ये तो हुआ मेरे ब्लॉग का पहला भाग। अब दूसरा भी पढ़ लीजिए।
राजस्थान का शिक्षा विभाग इन दिनों किसी प्रयोगशाला की तरह काम कर रहा है। हर महीने एक नया प्रयोग और हर प्रयोग की कीमत चुकाते शिक्षक।
ताज़ा आदेश: तीसरी से आठवीं तक की परीक्षाओं की कॉपियां शिक्षक जांचें, अंक भरें, रिपोर्ट-3 तैयार करें और फिर मोबाइल से फोटो खींचकर सिस्टम पर अपलोड भी करें। विभाग इसे ‘पारदर्शिता’ कह रहा है, शिक्षक इसे ‘अत्याचार’ कह रहे हैं।
अब ज़रा दृश्य देखिए: गाँव के स्कूल में नेटवर्क के नाम पर दो डंडी आती हैं और विभाग कहता है “कॉपियां अपलोड कर दो।” अंदरूनी ऐप पाँच मिनट में तीन बार लटकता है और नोटिफिकेशन ऊपर से आता है कि “समय पर कार्य पूरा नहीं हुआ तो जिम्मेदारी आपकी।”
ये कैसा शासन है, जहां सर्वर विभाग का और ग़लती शिक्षक की। शिक्षक दौड़-दौड़कर बच्चों को पढ़ाते हैं, फिर उसी दिन दौड़कर कॉपियां जांचते हैं, रात को घर जाकर मोबाइल की टॉर्च जलाकर तस्वीरें खींचते हैं और अगली सुबह हेडमास्टर पूछता है कि “अपलोड हो गया क्या। अरे भाई, शिक्षक हैं…कोई डेटा-एंट्री मशीन थोड़े ही। विभाग का ज़मीनी सच यही है। फाइलों में डिज़िटल राजस्थान, धरातल पर लटकता सर्वर और फट चुका शिक्षक। तारीखें ऐसी रखी जाती हैं, जैसे विभाग को पता ही न हो कि स्कूल में पढ़ाई भी होती है। 29 को परीक्षा खत्म, 3 तक रिपोर्ट-3 तैयार! फिर अपलोडिंग का महाभारत। ऐसा लगता है जैसे विभाग ने तय कर लिया हो शिक्षक बच्चे कम पढ़ाएँ, मोबाइल ज़्यादा घुमाएँ। शिक्षक संघ राधा कृष्णन की मांग बिल्कुल तार्किक है। यदि कॉपियां अपलोड करवानी ही हैं तो टेक्निकल स्टाफ दो, सर्वर मजबूत करो या फिर तारीखें बढ़ाओ। पर यहाँ तो उल्टा है, जिम्मेदारी ऊपर से नीचे आती है और जब समस्या नीचे से ऊपर जाती है, तो उसे “औपचारिकता” बताकर टाल दिया जाता है। राजस्थान के हर जिले में यही आक्रोश है। चाहे कोटा हो या बांसवाड़ा, बीकानेर हो या करौली, हर जगह शिक्षक पूछ रहे हैं कि आख़िर क्या शिक्षा विभाग का लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है या बस डेटा इकट्ठा करना। विभाग की नीतियां धीरे-धीरे शिक्षकों को सिस्टम का गुलाम बनाती जा रही हैं। यदि यही चलता रहा तो आने वाले वर्षों में गुणवत्ता नहीं, थकान, तनाव और तकनीकी बोझ ही स्कूलों की पहचान बन जाएगा।
शिक्षा विभाग को चाहिए कि वह यह समझे कि शिक्षक को शिक्षक रहने दें। उसे हर भूमिका में मत घसीटिए नहीं तो आने वाली पीढ़ियों से पहले शिक्षक ही थककर बैठ जाएंगे।
*सुरेन्द्र चतुर्वेदी, पत्रकार*