बाघ शहर में, इंसान जंगल में: सभ्यता का उलटा सफर

AYUSH ANTIMA
By -
0




कभी जंगलों में बाघों की दहाड़ इंसान के भय का कारण हुआ करती थी। आज वही बाघ शहरों की सड़कों, गलियों और खेतों तक पहुँचने लगे हैं। दूसरी ओर, इंसान उन्हीं जंगलों की शरण में घर, घोंसले और नेचर होम बसाने लगा है। यह दृश्य किसी कल्पना या संयोग का नहीं, बल्कि हमारी तथाकथित सभ्यता के उलट चलने का प्रमाण है—जहाँ इंसान जंगलों में है और खूंखार जानवर शहरों में। सभ्यता का अर्थ कभी था संवेदना, संतुलन और सह-अस्तित्व। पर जब विकास के नाम पर इंसान ने जंगलों को काटा, नदियों को मोड़ा और पहाड़ों को खोदा तो उसने प्रकृति के क्षेत्र में अतिक्रमण किया। आज जब बाघ या हाथी शहरों की ओर आते है तो वे हम पर हमला नहीं करते, वे केवल यह जताते हैं कि हम उनके घरों में दखल दे चुके हैं। उनका शहर में आना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक मौन प्रतिरोध है। जंगलों के जानवर भूख से मारते हैं पर शहरों के इंसान लालच से। जंगल में हिंसा जीवन का नियम है पर शहर में हिंसा स्वार्थ का उपकरण। जंगलों में जानवर जीवित रहने के लिए लड़ते हैं, शहरों में इंसान वर्चस्व के लिए। इसीलिए आज बाघ की दहाड़ से कम, इंसान के निर्णयों से ज़्यादा भय पैदा होता है। इंसान अब जंगलों में लौट रहा है पर वह शांति नहीं, विलास खोजने गया है। लकड़ी की कुटिया और इको रिसॉर्ट बनाकर वह उसी प्रकृति की गोद में लौटने की कोशिश कर रहा है, जिसे उसने उजाड़ दिया था। यह वापसी आत्मा की नहीं, सुविधा की है; यह क्षमा नहीं, पलायन है। आज बाघ शहर में घूमता है तो वह हमें आईना दिखाता है, तुमने मेरी दुनिया छीनी, अब मैं तुम्हारी दहलीज पर हूँ। वहीं इंसान जब जंगल में घर बनाता है, तो मानो कहता है, मुझे शांति चाहिए, जो अब शहरों में नहीं बची।" जब जंगल और शहर की सीमाएँ मिटने लगें, तो समझना चाहिए कि सभ्यता का संतुलन टूट गया है। अब खतरा बाघ से नहीं, बल्कि उस इंसान से है, जिसने अपने भीतर के बाघ को पाल लिया है। सभ्यता ने हमें कंक्रीट के शहर दिए, पर इंसानियत को धीरे-धीरे जंगल में निर्वासित कर दिया। बाघ शहर में घूम रहा है, इंसान जंगल में घर बसा रहा है, यह दृश्य सिर्फ पारिस्थितिकी का नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक पतन का प्रतीक है। अब सवाल यह नहीं कि कौन कहाँ है, सवाल यह है कि कौन ज्यादा खूंखार हो गया है—जंगल का बाघ, या शहर का इंसान। 

*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!