।।संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज द्वारा उपदेश।। सजनी रजनी घटती जाइ, पल-पल छीजे अवधि दिन आवे, अपनो लाल मनाइ॥ अति गति नींद कहा सुख सोवे, यहु अवसर चल जाय। यहु तन बिछुरे बहुर कहँ पावे, पीछे ही पछताय॥ प्राण पति जागे सुन्दरि क्यों सोवे, उठ आतुर गह पाइ।कोमल वचन करुणा कर आगे, नख-शिख रहु लपटाइ॥ सखी सुहाग सेज सुख पावे, प्रीतम प्रेम बढाइ। दादू भाग बड़े पिव पावे, सकल शिरोमणि राइ॥ अर्थात हे चित्तवृत्ति ! तुम मेरी सखी के तुल्य हो, इससे मैं तुझे सावधान कर रहा हूं। तुम अगाध निद्रा में सोई हुई हो। आयु प्रतिक्षण दिन-रात की तरह क्षीण हो रही है। अत: अपने प्यारे प्रभु को जल्दी ही प्रसन्न करो। अभी तुम को बहुत दूर जाना है। अविद्या में सोते रहने से राम-भजन का अवसर नदी के तरङ्ग की तरह दिन-रात बीता जा रहा है। इसी शरीर से भगवान् प्राप्त किया जाता है अन्यथा अन्त में पश्चाताप करना पड़ेगा। प्राणेश्वर परमात्मा तो भक्तों को दर्शन देने के लिये उत्कण्ठित रहते हैं, फिर भी तू कैसे सोई हुई है, शीघ्र ही खड़ी होकर (जागकर) हरि के चरणों की शरण ग्रहण करके अति नम्रता से करुणापूर्ण स्वर से भगवान् की स्तुति कर। नख से शिखा पर्यन्त सारा शरीर भगवान् को अर्पण कर दे। प्रियतम प्रभु के साथ प्रेम करो, प्रेम करने से ही वे तुम्हारी- हृदय-शय्या पर जब आयेंगे, तब तेरे को सौभाग्य-सुख प्राप्त होगा। भाग्यवान् ही भगवान् को प्राप्त कर सकता है। अध्यात्मरामायण में हे मुने! यहां क्षण में आपत्तियां आती हैं और क्षण में सम्पत्तियां, क्षण में जन्म और क्षण में मृत्यु। इस जगत् में कौनसी ऐसी वस्तु है कि जो क्षणिक न हो। हम कहां उत्पन्न हुये, मनुष्य पहले कुछ और ही था, थोड़े दिनों बाद कुछ और प्रकार का हो जाता है। यहां एक रस रहने वाली सुस्थिर वस्तु कोई भी नहीं है। अत: अज्ञान से जाग कर वृद्धावस्था से पहले ही भगवान् का भजन कर लेना चाहिये।
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