झुन्झुनू जिले में बेसहारा गौवंश और गौशालाओं के संचालन को लेकर आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) ने अपने लेखों में बार बार कहा है कि गोशालाओ के संचालन की आड़ में डेयरी का संचालन किया जा रहा है। विदित हो जहां डेयरी का संचालन होता है, वहां किस तरह धन उपार्जित किया जाए, चाहे वह धन अनैतिक काम करके ही आए यह सोच आ जाती है। यही कारण है कि बहुत सी गौशालाओं में स्वयंभु अध्यक्ष बने बैठे हैं क्योंकि वहां किसी तरह की चुनावी लोकतंत्रिक प्रणाली वर्जित है। इसका एक ही मूल कारण है कि यदि कोई ईमानदार कार्यकारिणी आ गई तो उनके काले कारनामे जनता के समक्ष आ जायेगे और गौ सेवा का मुखौटा उतर जायेगा। इसी तरह की बात झुन्झुनू जिले में संचालित गोशालाओ की उजागर हुई है। सूत्रों के अनुसार जिले में सात गौशाला के प्रबंधकों द्वारा 1.75 करोड़ रुपये का फर्जी सरकारी अनुदान उठाने का प्रयास करने का मामला प्रकाश में आया है। इन गौशालाओं ने 2444 गौवंश का सरकारी अनुदान उठाने का प्रयास किया लेकिन जांच में केवल 1697 ही गौवंश पाए गये। विदित हो गौशालाओं में जांच का जिम्मा पशु चिकित्सको का है। इन पशु चिकित्सको ने गौशाला संचालकों से मिलिभगत कर उनके आवेदन में दर्शाए गये गौवंश को सही बताते हुए भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट दे दी लेकिन इसको लेकर संदेह होने पर दूसरी सत्यापन टीम द्वारा यह फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। इस फर्जीवाड़े के उजागर होते ही 1.75 करोड़ के सरकारी अनुदान पर रोक लगा दी गई। फर्जीवाड़े के उजागर होते ही जिला प्रशासन ने उन पशु चिकित्सको को नोटिस थमाने के साथ ही निदेशालय को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए लिखा है। अब यदि बेसहारा गौवंश को लेकर जिला कलेक्टर के आदेशों की बात करें तो करीब 250 बेसहारा गौवंश तो इन्हीं सात गौशालाओं मे उन्हे आसियाना मिल सकता था लेकिन गौवंश की आड़ में जो स्वार्थ का खेल हो रहा है, वह इन बेसहारा गौवंश को आसियाना देने में बहुत बड़ी बाधा साबित हो रही है। सनातन धर्म में गाय को पूज्या मानने के साथ ही यह धार्मिक धारणा है कि गाय मे सभी देवताओं का वास होता है। जो व्यक्ति गाय की सेवा करता है, उसे किसी भी देवता की आराधना करने की जरूरत नहीं लेकिन जिले के इन गौशालाओं के संचालकों ने केवल अर्थ को ही सब कुछ मान लिया है। गौशाला संचालक दिखावे में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे, गौशाला के गौवंश को छतीस भोग लगाकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं, जबकि बेसहारा गौवंश सड़कों पर कूड़ा करकट खाता है, वह दिखाई नहीं देता। झुंझुनूं जिला भामाशाहों की जननी रही है और प्रवासी भामाशाहों द्वारा सरकारी अनुदान के अलावा उदारमना से आर्थिक सहयोग करते रहते हैं। उन भामाशाहों का आर्थिक सहयोग करने का एकमात्र मंतव्य होता है कि गौवंश को कैसे बचाया जाए लेकिन यह गौशाला संचालक उन भामाशाहों को भी अंधेरे में रखकर अपने स्वार्थ की प्राप्ति में लीन रहते हैं।
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