किसी भी प्रकरण को लेकर किसी दूसरे की कलम पर अंगुली उठाने से पहले अपनी गिरेबान में झांकना जरूरी होता है। मैंने मेरे लेखों में कभी भी अस्पताल प्रशासन को उचित नहीं ठहराया। मेरा मंतव्य यही रहा है कि दोनों पक्षों की बातों को जनता की अदालत में रखना ही पत्रकारिता की श्रेणी में आता है। यदि एक नवम्बर से 20 नवम्बर तक अस्पताल में हुई विभिन्न जांचों का आंकड़ा देखें तो 941 में से 906 रोगियों की एक्सरे जांच की गई। इसके साथ ही इस अंतराल में 13814 अन्य प्रकार की जांचे की गई। जिनमें 2126 ब्लड शुगर, 320 डेंगू, 1978 सीबीसी व 287 एचआईवी की प्रमुख हैं। सोनोग्राफी की बात करें तो इस अंतराल में कुल 59 हुई है। सोनोग्राफी को लेकर इस बात पर भी चर्चा करना जरूरी हो जाता है कि चिड़ावा उप जिला अस्पताल में 2023 में रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति हुई थी, लेकिन वे सीनियर रेजिडेंसी के लिए एक साल के लिए चले गए। 19 जुलाई 2025 को उन्होंने फिर से ड्यूटी ज्वाइन की, जैसा कि मीडिया में भी प्रकाशित हुआ था। इसी बीच फरवरी 2025 में अस्पताल में नई सोनोग्राफी मशीन स्थापित की गई। रेडियोलॉजिस्ट की अनुपस्थिति में मात्र 10 दिन की ट्रेनिंग देकर स्त्री रोग विशेषज्ञ को मशीन संभालने की जिम्मेदारी दे दी गई, जबकि किसी भी डॉक्टर को सभी प्रकार की सोनोग्राफी करने के लिए करीब छह महीने का सोनोलॉजी कोर्स करना अनिवार्य होता है। यह मामला तब होता है, जब विशिष्ठ तकनीकी प्राप्त रेडियोलॉजिस्ट के न होने की दशा में पीएमओ ने वैकल्पिक व्यवस्था की, जिससे आमजन को परेशानी न हो लेकिन जिस डाक्टर को यह जिम्मेदारी दी गई, वह सभी प्रकार की सोनोग्राफी जांच करने में सक्षम नहीं था। अब सवाल उठता है कि जो स्थानीय नेता विकास का दंभ भरते रहे हैं, क्या उनके संज्ञान में नहीं था कि रेडियोलॉजिस्ट अनुपस्थित है ? यदि था तो उन्होंने सरकार व उच्च अधिकारियों को इस बात को लेकर सूचित क्यों नहीं किया। रेडियोलॉजिस्ट अनुपस्थित रहना सरकार व स्थानीय नेताओं की अकर्मण्यता को इंगित करता है। जो पत्रकार यह आरोप लगा रहे हैं कि उनके साथ मारपीट हुई है तो यह जांच का विषय है व कानून के दरवाजे हर व्यक्ति के लिए खुले हैं। पत्रकारों को इस बात को लेकर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि यह प्रहार पत्रकारों पर नहीं बल्कि लोकतंत्र के स्तम्भ पर प्रहार है।
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