भारत की अर्थव्यवस्था एक बड़े संक्रमण दौर से गुजर रही है और इसका सबसे गहरा असर मध्य-वर्ग पर पड़ने वाला है। अर्थशास्त्री सौरभ मुखर्जी ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में करीब 20 मिलियन (2 करोड़) भारतीयों की नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं। इसका मुख्य कारण है— ऑटोमेशन, AI, वैश्विक व्यापार अनिश्चितता और घरेलू आर्थिक दबाव।
सैलरी-वेतन वर्ग, जिसकी संख्या 8–12 करोड़ के बीच है, भारत के कुल कार्य बल का केवल 20–21% हिस्सा है, लेकिन यह वर्ग सबसे अधिक होम-लोन, कार-लोन और EMI पर निर्भर करता है। ऐसे में नौकरी का खतरा सीधे तौर पर परिवार की आर्थिक स्थिरता को हिला सकता है। तेजी से बढ़ती गिग-इकोनोमी, जो आज 80 लाख से 1.2 करोड़ तक पहुँच चुकी है—पारंपरिक स्थायी नौकरियों की जगह ले रही है, पर इसमें सुरक्षा और स्थिर आय की कमी है। वहीं भारत का घरेलू ऋण GDP का 42–43% हो चुका है, जो संकेत देता है कि मध्य-वर्ग पहले से अधिक कर्ज के बोझ में है। मुखर्जी का मानना है कि यदि वैश्विक व्यापार, विशेषकर अमेरिका के साथ समझौते नहीं सुधरे, तो सेवाओं और निर्यात-क्षेत्र पर दबाव बढ़ेगा और व्यापक स्तर पर नौकरियाँ प्रभावित हो सकती हैं। संक्षेप में, भारत का मध्य-वर्ग तीन मोर्चों पर दबाव झेल रहा है— नौकरियों का संकट, गिग-इकोनोमी का विस्तार, और बढ़ता कर्ज। यह स्थिति यदि समय रहते नहीं संभाली गई, तो देश की आर्थिक गति और सामाजिक संतुलन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*